Sunday, 25 December 2022

01. आ. अनंत पुरोहित जी


मावस रात~

झिलमिल दीपों से

रौशन घाट।


दीप उत्सव~

दरवाजे लटका

धान की बाली।


गेंदा उद्यान~

ओस फैले घास पे

पग के चिह्न


जर्जर पुल~

नाक दाबे हाथ से

राह पे लोग।


पहाड़ी घाटी~

देवदार नोक पे

जमा तुषार


श्रावणी झड़ी~

प्रेमी गुनगुनाया 

राग ठुमरी


पूस की भोर~

ओस की बूँदें बनी

पैरा पे बर्फ 


मेघ गर्जना~

मयूर की चोंच से

छूटा भुजङ्ग 


रात में झंझा~

तापमापक पर

टपका आँसू 


श्रावण साँझ~

बैलगाड़ी का चक्का

गड्ढे में फँसा 


02. आ. अनुपमा अग्रवाल जी


जल फव्वारा

बालक के मुख से--

इंद्र धनुष।


तेल की रस्म~

बाग में हल्दी लिए

विधवा माता।


अंधे पुत्र का

हाथ पकड़े बाबा~

भीगी सड़क।


जल प्रपात~

अजगर मुख में

वानर ग्रीवा।


वट सावित्री ~

गणिका की मांग में 

भरा सिंदूर।


अर्ध यामिनी~

रुग्णवाहिनी स्वर

गली में गूंजा।


पहाड़ी पथ~

वायु वेग से बने

हिम के रोल


घनेरे मेघ~

महासागर फैले

बर्फ के पुष्प 


शीत मध्याह्न~

बरनी के धुएँ से

हींग सुगंध। 


सर्द फाल्गुन ~

युग्म इंद्रधनुष

अचल पीछे।


03. आ. अभिलाषा चौहान जी


हल्दी की रस्म~

विधवा के हाथ में

लाल चूनर...


द्वार पे ईख~

आंगन में चौक पे

सिंघाड़ा-कंद।


हिमस्खलन~

उत्तुंग श्रृंग पर

पर्वतारोही...


गोधूलि बेला --

प्रसूता के कक्ष से

लोबान गंध..


छत पे काग~

वृद्ध मां-बाप पोंछे

आंखों के कोर..


ग्रीष्म मध्याह्न~

शीश घट उठाए

रेत पे बाला।


मेघ गर्जना~

चावल ढेरी मध्य

सुई गाड़ी मां


बिल्ली का शव~

ज्योतिषी पोथी खोले

आंगन मध्य..


ओस की बूँदें 

विद्युत तार पर ~

कपोत झुंड...


बीहड़ वन~

बबूल के तने से

खुरची गोंद..


04. आ. अनुराधा चौहान जी


दाह संस्कार~

पति लिए हाथों में

मोगरा लड़ी।


अचार गंध~

बालिका के हाथ में

मिट्टी का घड़ा 


धान के खेत~

पत्नी की टोकरी से

मिष्ठान गंध।


विवाहोत्सव~

तोहफे में निकली

प्याज टोकरी।


अलकनंदा~

धार मध्य पकड़ी

भाई को बाला।


शरद साँझ~

माँ अलाव में डाले

नीम पत्तियाँ।


पौष मध्यान्ह~

दादी के पोटली से

सपड़ी गंध।


पौष मध्यान्ह~

आँगन में बनायी 

माँ तिल पट्टी।


चैत्र मध्यान्ह~

पलाश फुगनी पे

तितली झुंड/भ्रमर गूँज


पोळा-पिठोरा~

बैल सींग पे पुष्प

माला घुँघरू।


05. आ. अनिता मंदिलवार "सपना" जी


वर्षा की रात ~

मिट्टी का वो घरौंदा

है औंधा गिरा ।


अक्षय व्रत ~

वट पत्ता जूड़े व

माँग सिन्दूरी ।


हटे तिमिर ~

सपने जेहन में

दस्तक दिये ।


खुशबू तेरी

मुझ तक पहुँची ~

शीतल हवा ।


शुक्र का तारा ~

दादी निहारे नभ

त्रियामा काल ।


इत्र गुलाब 

महके उपवन ~

कृत्रिम पौधे ।


संक्रांति काल ~

तिल-गुड़ की गंध

गाँव गली में ।


झील में अख़्स

झिलमिल तुम्हारे ~

पुराने ख़त ।


भौंरा गुंजन

बसंत बगिया में ~

सहेली संग ।


फागुनी धूप

चमकाए चेहरे ~

नगाड़े धुन ।


06. आ. अनिता सुधीर जी


चांद का बिम्ब

झील पे झिलमिल~

नाव में प्रेमी।


नदी में कश्ती~

डूबते नाविक ने 

शाख पकड़ा


कुत्ते की रोटी

मुन्नी से छीने वृद्धा~

भ्रमण काल 


अस्ताचल में 

आसमान रक्तिम~

पत्नी द्वार पे


गोधूलि बेला~

सागर में रंगीन

सूर्य का बिम्ब 


जल प्रपात ~

चोंच में मीन रखे

ठूँठ पे वक 


पहाड़ी नदी ~

पत्थर पर खड़ी 

भीगी युवती 


झील में हंस ~

श्वेत कमल पर

मधुप दल


मध्याह्न तम

में दीप्त मृग नैन~

शेर गर्जन


बिमार पुत्र --

बालक की तरह

रोया उलूक


07. आ. अनीता सैनी जी


शीतलहर~

फटे पल्लू से मुख

निकाले शिशु।


संध्या लालिमा~

ग्वाले की बांसुरी से

गूंजी गौशाला।


कुहासा भोर -

पिता संग खेत में 

खींचती हल |


रक्तिम साँझ~

पगडंडी निहारे

बुजुर्ग माता।


वन में ठूँठ~

बरगद के नीचे

लकड़हारा।


मेघ गर्जन~

वृद्ध लिए हाथ में

फूस गट्ठर।


निर्जन गली ~

जर्ज़र हवेली से 

पायल ध्वनी |


संध्या लालिमा ~

कंधों पे लादे धान 

वृद्ध किसान 


ज्येष्ठ मध्यान्ह ~

तपती रेत पर 

ऊँट का शव |


कुहासा भोर ~

वृद्ध कृषक नोंचे 

गाजर घास |


08. आ. डाँ. अनीता रानी भारद्वाज जी


हिन्दी दिवस~~

करतल ध्वनि से

गूँजा कमरा ।


प्रथम ज्येष्ठ~~

चूल्हे में हाथ सेंके

वृद्ध युगल ।


जन्म दिवस~~

चाकू की नोंक पर

रक्त के धब्बे।


प्रेम दिवस~~

विधवा के हाथ में

गुलाब कली ।


विवाह रस्म ~~

जामुन की छाँव में

दूल्हा दुल्हन ।


प्रभात धुंध~~

बोरी ओढ़े बालक

फुटपाथ पे ।


श्मशानघाट~

नीम वृक्ष के नीचे

श्वेत गठरी ।


छाज में मूंग ~~

शटर पर बैठे

कपोत जोड़ा ।


सावन झड़ी~~

हाथ फैलाए खड़ी

आँगन मध्य ।


बिजली द्युति~~

डाकिया के हाथ में

रक्तिम खत ।


09. आ. अंकित सोमवंशी जी


होली दहन -

बिन जौ की बाल ले

खड़ा किसान।


होलिका पर्व~

रक्तिम हाथ लिये

खड़ा सैनिक।


श्वेत बादल -

सूर्य का प्रतिबिंब

पोखर मध्य।


पहाड़ी मार्ग -

बंदूक कांधे लिये

खड़ा जवान।


धान का खेत~

हिमकण ढेरी को

ताके कृषक


बारिश सांझ -

पेड़ टंगे नीड़ से

चिड़िया स्वर।


हिमालय में

उफनती गंगोत्री~

नीले पत्थर।


गहन वन~

झाड़ियों मध्य बाला

लिये कृपाण।


टूटी दीवारें 

और घरों में आग~

राह पे शव।


चाँदनी रात ~ 

लुटेरों का नायक

अंधी के घर।


10. आ. आभा खरे जी


नाव की सैर-

पत्थरों के काई से 

शुरु कहानी


जाड़े की छुट्टी-

दादी के कमरे में 

दवा का ढेर


घना कोहरा-

बूंदों के चित्रांकन

विंड स्क्रीन पे


बैठी तितली

प्रदर्शनी फूल में --

कैमरा फ्लैश


अधूरा गीत-

जन्म दे गुज़री माँ 

देखे फ़ोटो से 


जीर्ण घर की

छत से गिरे बूँद --

बर्तन ध्वनि


टूटा छप्पर --

बाबा की तस्वीर पे 

आभा के छाप


प्रभात सैर 

पर्वत के किनारे --

कुश झोपड़ी


टूटी ऐनक --

रिस रही दीवारें

बूढ़े घर की


माघी पवन --

अमवा के डाल से

झरी मंजरी


11. आ. आरती सिंह 'एकता' जी


लालिमा व्योम --

मेघों की टोली संग

उड़े विहंग


खिले कुसुम

कच्ची डगर में --

मैं और तुम


सूत में बंधे

सात फेरे लेकर --

कठपूतली


खुले बाजार

तन के मोल लगे --

प्रदोष काल


खेत की मिट्टी

किसान ने टटोला --

सावन झड़ी


हरसिंगार

बिछ गया जमीं पे --

राश पूर्णिमा


कजरी तीज --

व्रती मध्य झूला व

सात लोइयां


लौकी की बेल

कबेलु की छत में--

गेंद व बाला


चांद का बिम्ब 

थाली पर दमके-

ताख का दीया


दीवाली पर्व --

उदास बैठी लक्ष्मी

घर की बहू।


12. आ. आरती श्रीवास्तव जी


भोर की बेला--

गुलाब पंखुड़ी से

उड़ी तितली।


तारों की आभा--

प्रेमी प्रेमिका करे

जल विहार।


भोर लालिमा--

कलरव से गूंजा

फूलों का बाग।


वर्षा समाप्त ~~

बालक के हाथ में

कागजी कश्ती ।


स्कूल वाटिका--

योगारत बच्चे के

मुँह पे मास्क


संक्रांति पर्व--

मेरी पतंग लूटे

छत पे पत्नी।


हल्की फुहार--

शाक के ठेला लिए

दिव्यांग पुत्र।


बांस के पेड़--

झोपड़ी से उठती

बास्ता की गंध।


स्वर्ण पदक

चूमे दिव्यांग बाला--

खेल मैदान।


गन्ने का खेत--

शेर मुख में चाकू

घोंपी बालिका।



13. आ. आशा शुक्ला जी

रेत का टीला~~
हवा का झोंका लाया
सूखे पल्लव।

अभिसारिका
खड़ी द्युति पथ पे~ 
भादों की अमा।

हरित कुँज~
रक्तसिक्त हिरण
गुफा के द्वार।

विद्युतप्रभा~
घने वन में वृद्धा
लाठी टेक ली।

आकाशगंगा~
छत पे दूरबीन
झाँकता बच्चा....

गली में स्त्रियाँ~
जली रोटी की गंध
पाकशाला से।

नागपंचमी ~
दूध लिए बाला पे
सर्प का दंश ।

मोगरा गंध~
प्रियतम का चित्र
ताकती वधू ।

बंजर भूमि~
बालक के हाथ में
आम का पौधा।

गन्ने का खेत~
लाठी लिए वृद्ध पे
झपटा बाघ..

14. आ. डॉ. इन्दिरा गुप्ता यथार्थ जी

कचरा ढेरी --
भिनभिनाते मक्खी
हाथ के रोटी 

मिष्ठान गन्ध -
बुढ़िया के पत्तल 
बासी महकी

शिला का टापू ~
घड़ियाल के अण्डे
टूटी नाव में ।

तूफानी रात~
फुटपाथ पे गिरा
वृद्ध द्वियांग।

मृदंग थाप --
घुंघरू को पटकी
दिव्यांग बाला।

पश्चिमी सूर्य -
दीपक भरे ठेला
कुम्हार द्वार।

विरह गीत --
आश्रम में बाला की
कटि उभार।

राष्ट्रीय गीत --
एवरेस्ट चोटी पे 
दिव्यांग बाला।

प्रयागराज - 
संगम पे फिसला
लंगड़ा वृद्ध।

घुप अंधेरा - 
नीड़ में चमकते
जुगनू दल 

15. आ. इन्द्राणी साहू जी

चाँदनी रात ~
बाहों में बाहें डाले 
प्रेमी युगल ।

वट में सर्प ~
कोटर में चहके
कागा के बच्चे ।

नन्दन वन ~
कृषकाय तेंदुआ 
पिंजरबद्ध ।

निर्जन वन ~
हिरण को दबोचे 
भेड़िया झुंड ।

पुआल ढेरी ~
अन्न कण उठाया
वृद्ध दिव्यांग ।

बर्फीली झील ~
जलक्रीड़ा में रत
युगल पक्षी ।

शीत लहर~
घन उठाई स्त्री के
माथे पे स्वेद ।

तारों की आभा ~
परिरंभण हुआ
प्रेमिका संग।

पंक में फूल~
रक्तिम सूर्यरश्मि
अंबरांत में ।

कुहासा भोर~
पटरी के किनारे
विदीर्ण शव

16. आ. डॉ इंदु गुप्ता जी

पूनम रात्रि~
नौका विहार करे
प्रेमी युगल।

विटप वृंद-
आम से लदी डाली
झुकी धरा पे

प्रेम दिवस--
फुसफुसाया जोड़ा
वृक्ष आड़ में

निर्जन पथ~
खरगोश के पीछे
कुक्कुर झुंड।

बच्चों का झुण्ड~
लहर तट आए
सीप व घोंघे

अमावस्या में
राह ताकती माता~
द्वार पे दीप

निरभ्र नभ~
मछुआ फेंका जाल
तड़ाग मध्य

घन गर्जन--
मुख में अन्न लिये
चींटी कतार

प्रेम दिवस~
समाधि स्थल पर
सुमनार्पण/कुसुमाँजलि

 खनकी चूड़ी~
शयन कक्ष द्वार
पिया ने खोला

17. आ. उमेश मौर्य जी

डीजे की धुन -
मेकअप के बाद
हँसी दुल्हन

इन्द्र धनुष ~
बादलों से निर्मित
कलाकृतियाँ

पर्दे ओट से
झाँक रही युवती-
वर्षा की बूँदें

गृह प्रवेश -
कोने में मकड़ियाँ 
बुनती जाल

झील में चाँद-
प्रेयसी की प्रतीक्षा 
करते बैठा

वट का वृक्ष - 
बिछड़ो की याद में
थका पथिक

तारे की आभा-
आँगन में गिनती
रटता बच्चा

मेथी के दाने - 
डिबिया में बंद थी
नानी की यादें

चाय की पत्ती - 
बागान में गूँजता
आसामी गीत

भेड़ों का झुण्ड-
गड़रिये के गीत
गूँजा गाँव में

18. आ. ओमप्रकाश क्षत्रिय "प्रकाश" जी

जाड़े की रात~
तस्वीर साथ रखे
सोती विधवा ।

बाल वाटिका~
लड़की को दबोचे
गुण्डा समूह ।

निर्जन गली~
माशुका के घर में
झांकता पति ।

नीम का वृक्ष~
दातुन लेकर माँ 
बेटे के पीछे।

घना कोहरा~
कार में दबी माँ का
मुख टटोला। 

झींगुर स्वर~
जलमग्न कुटी से
वृद्धा की खाँसी।

पकी फसल ~
लट्ठ से नील गाय
मारे किसान।

मुर्गे की बांग~
चक्की पर चावल
पीसती दादी।

बीन की धुन~
पत्थर लिए बच्चे
क्रीड़ांगन में।

शिशु रुदन~
गर्भिणी माँ के सिर
गिट्टी तगाड़ी।

19. आ. ऋतु कुशवाह "लेखनी" जी

घना कोहरा-
कुड़ेदान में सोए
माँ संग बिल्ली

कचरा पन्नी
सम्हाले नन्ही बच्ची-
स्कूल का द्वार

बेटी का चित्र
माँ छाती से लगाये-
शादी का घर

पुष्परहित 
पौधा प्रिया की भेंट-
लाल गुलाब

कंज का रस
संध्या मे पिए भृंग-
अर्ध पुष्पित

माँ छाया खोजे
शावक मुंह लिए-
ज्येष्ठ मध्यान्ह

आसमान में
पक्षियों संग बेटी-
पैरासेलिंग

बाढ़ का शोर-
सिक्के खोजे गङ्गा में
निर्वस्त्र बच्चा

शिशु को लिए
खेत जोते विधवा-
रबी फसल

खाली सड़क-
भिखारी के डिब्बे में 
बूंदों के स्वर'

20. आ. ऋतासिंह सर्जना जी

रक्तिम साँझ -
नदिया के उपर
उड़ता पक्षी

धूल से सनी
फागुनी हवा उड़ी-
महुवा गंध

डाली की फूल --
बगिया में युवती
का फोटोग्राफ

नदी का तट --
मछुवारे की जाल
फँसी मछली

झील में चाँद --
उसके मेरे साथ
के वो लमहें

टूटी डाली में
नीड़ विक्षत चूजे --
पक्षी समूह

वृक्षा रोपण --
फोटो के मुद्रा लिए
हाथ में पौधा

वर्षा के बाद
बादल छँट गए --
महके छोले

शिशु माँ बिन --
दूध भरा बोतल
झोंके से गिरा

काँटे की नोक
बची आखिरी बूँद --
सेल्फी में हम

21. आ. ऋतु असूजा ऋषिकेश जी

अक्षय तीज~
खिलौना पकड़ के
फेरे बालिका। 

शरद संध्या~
पंसारी के थैले में
सिक्के खनके।

कानन पथ~
वानर छीन लिया
हाथ से थैला।

श्रावणी भोर~
भाई के शव पर
राखी चढ़ायी।

सांझ लालिमा ~ 
तिकोनी आकृति में
खग समूह

मेघ गर्जना~
लोरी तान गूंजी 
दादी के कक्ष।

भोर लालिमा~
मधुशाला में झाँके
बुजुर्ग पिता ।

भोर लालिमा~
सरसीरुह मध्य 
मृत भँवरा।

पौष मध्यान्ह~
माँ दुशाला पे बुनी
बेल बूटियाँ।

माघ मध्यान्ह~
हाथ छड़ी लेकर
सुखाती बड़ी।

22. आ. कान्ता अग्रवाल जी

पूस की रात-
बर्फ़ से आच्छादित
पेड़ पहाड़ी।

पूनम रात्रि-
पिया के गालों पर
मली गुलाल ।

सरिता तट~
शिकारी का बंधक
कस्तूरी मृग 

कस्तूरी गंध~
हिरण की नाभि में
धँसी बरछी

बंजर खेत~
चटके जमीन पे
पीले अंकुर।

गंगा का घाट-
डोर बंधे पतंग 
बच्चों के हाथ

चाँदनी रात~
बोतल में जुगनू
बाल हस्त पे।

नीड़ में खग-
पीपल तने चुभे
टूटी कुल्हाड़ी

चौथ का चाँद -
लपटों बीच घिरी
वधू की चीख़ 

प्रेम दिवस—
पुष्प दिया वेदी पे
नवयुवक ।

23. आ. कुसुम कोठारी जी

भानुदय का
सरोवर में बिम्ब ~
कमल दल।

बुड्ढे ऋषभ~
किसान के हाथ में
लाठी व रस्सी।

बेला पे ओस --
पत्तों से शाखा छूती 
चन्द्र किरणें

पहाड़ी पे गौ~
तराई की झील में
नौका विहार।

सूरज रश्मि ~
ताल के फूल पर
बैठा भ्रमर।

सांझ के दीप~
नट रस्सी खिंचके
नचाता कपि

पेड़ पे बच्चा~
डाली पर लटके
किंग कोबरा 

जल प्रपात ~
पत्थर से गोरी का
पांव फिसला।

चौथ का व्रत~
तिरंगे में लिपटा
पिया का शव।

घुप्प अॅ॑धेरा~
कोर पे सौदामिनी
जलधर के 

24. आ. कुमकुम पुरोहित जी

गाँव की गली~
चाँदनी रजनी में
लेटे बुजुर्ग ।

ज्येष्ठ मध्याह्न ~
पति के चरणों में 
दीपाराधना।

खेल मैदान ~
बाल झुण्ड से उड़े 
धुएँ के छल्ले ।

भोर लालिमा ~
अलि स्वर से गूँजी
फूलों की घाटी ।

पावस भोर ~
फुदकते भेक के
पीछे बालक।

राह में पुष्प~
चुगता पंछी झुण्ड 
लाई का दाना।

रेत महल ~
खिलखिलाया बच्चा
सिंधु तट पे।

कार्तिक साँझ~
झोपड़ी छत पर
आकाश दीप ।

सूखे पत्तियाँ~
करधन पे खोंचे
पैसों का थैला

ज्येष्ठ मध्याह्न ~
दादा के फटे जूते
पहने बच्ची

25. आ. केवरा यदु "मीरा " जी

चाँदनी रात --
घुप्प अंधेरों में भी
पिया दीदार

टूटा ऐनक 
आँखों से हट गया-
मोतिया बिंद।

कटा  बिरवा -
मरघट में  पड़ा
पिया  का शव।

अंधेरी रात -
चोर के पीछे दौड़ा 
भौंकता कुत्ता ।

कुँवारी माँ ने 
कूड़े में रखी शिशु-
मिट्टी संस्कार ।

खौलता दूध 
आग बुझाने लगी-
टी.वी. में मग्न ।

केवड़ा गंध--
खुली संदूक तह
पुराना खत ।

नभ में बाज-
ठूंठ से लिपटाये
सर्प का जोड़ा।

रक्षाबंधन-
तिरंगा में लिपटा 
भाई का शव।

इत्र खुशबू --
बिखरे अल्फ़ाज़ों का
पुराना ख़त 

26. आ. केशरी सिंह रघुवंशी 'हंस' जी

मोगरा गंध~
वधू पहुँची द्वार 
अश्व आरुढ़

सांध्य लालिमा~
चौपाल पे मिश्रीत
रागिनी स्वर

ज्येष्ठ मध्याह्न~
आम्र बाग में गूँजे
बालक स्वर

नगाड़ा ध्वनि --
मुखिया के चौपाल
युवा मुंडन

सरसों खेत~
मधुमक्षिका दंश
बाल गाल पे

विविध पुष्प
फैले आँगन मध्य~
फाग पूनम

शराब गंध~
पति संग प्रेमिका
पत्नि द्वार पे

शीत यामिनी~
गर्भवती उठाई
कूड़े से रोटी

निर्जन पथ~
कांटा निकाले पुत्र
पिता पग से

फाग तेरस~
घुटे भांग धतूरा
आंगन मध्य

27. आ. क्रान्ति जी

बाल श्रमिक~
कोयले की खान में
चमका हीरा।

समुद्र तट~
पग चित्र बनाती
दिव्यांग बाला।

सघन वन-
वानरों के झुंड में
नन्हा हिरण।

घना कोहरा-
पहाड़ों में गूंजता
गज का स्वर।

गंगा का तट-
इंसानी लाशों पर
गिद्धों का झुंड।

आम्र मंजरी-
कोयल के स्वर से
गूंजित वन

रवि उदित-
गूंजता जंगल में
कुल्हाड़ी शोर।

छत पे कौआ-
डाकिया के हाथों में
शोक संदेश।

कुहासा भोर-
जंगल से उठता
सफेद धुंआ।

शय्यन कक्ष-
नवजात पे गिरा/गिरी
विषतूलिका।

28. आ. गीताँजली 'अनकही' जी

रक्तिम सांझ -
सागर तट पर 
आरंभ मेला 

बँसी की धुन -
बरगद के नीचे
मित्रों की टोली

पानी से भरी
टूट गई गागर -
लम्बी डगर 

ठण्डी रसोई -
कमरे में गूँजता
आर्त रुदन

सुप्त दुल्हन -
खिड़की के शीशे में 
चाँद का बिम्ब 

संगसितारा
गोताखोर के हाथ -
खंडित नौका 

हिना के पात --
दुल्हन के हाथ में
सगाई छल्ला

फटी पुस्तकें -
अंधेरी झोपड़ी में
दीप रोशन

गोली की गूँज -
गहरी घाटी बीच
भेड़ का झुंड

शीत पवन - 
वृक्ष की कोटर में 
मूँगफलियाँ 

29. आ. चमेली कुर्रे "सुवासित"

चिंघाड़ ध्वनि ~
अधठूठे डालियाँ
झड़ाए पत्ते

महुआ गंध --
चौपाल पर बूढ़े 
खिलखिलाये

शीत लहर~
पहाड़ पे बर्फ में
सैलानी झुंड।

निशीथ काल~
झुरमुट के बीच
बालिका शव ।

निर्जन गली~ 
माँ के शव समीप
सिसकी स्वर।

इमली वृक्ष --
टूटे नीड़ में खग
तिनका रखे 

शीत मध्याह्न --
झील पर देखती
मुखमंडल 

भोर लालिमा --
कूड़े ढेर से पन्नी 
उठाई बाला। 

इन्द्रधनुष --
बच्चियों का समूह 
निहारे नभ

कुहासा भोर~
पक्का मार्ग किनारे
वृद्ध का झुंड

30. आ. जयश्री शर्मा "ज्योति" जी

आटे में घुन -
भूख से रोते बच्चे
पूस की रात

चिता की राख -
विधान दरमियाँ
मुक्ति का सौदा

नदी का तट -
सद्यस्नाता नारी
बाट निहारे

पारा खिसका -
नव अन्न स्वागत् में
बड़ा उत्सव

बिखरे फूल -
ज़नाज़ा सज रहा
काठ का बक्सा

कोहरा छँटा -
रेलवे ट्रेक पर
बच्चे का शव

भीषण गर्मी -
बूढ़ा रिक्शाचालक
सवारी ढोता

केले का पत्ता -
पूजन की बेला में
शंख निनाद

अर्ध भास्कर -
अर्ध्य देते श्रद्धालु
नदी के तट 

मुर्गे की बांग -
द्वार से टकराई
वधू उनींदी।

31. आ. जयश्री पंडा जी

चाँदनी रात~
समंदर किनारे
वृद्ध युगल

पौष की ऊषा~
छेरछेरा गीत व
अरसा गंध।

जलते दीप~
कार्तिक पूर्णिमा को
रौशन घाट।

संध्या लालिमा~
घंटी के स्वर संग
उड़ती धूल

ज्येष्ठ मध्यान्ह~
आम के बगीचे में
वंशी की धुन।

पूस की रात~
लोमड़ी की आवाज
गाँव किनारे

छत पे काँव--
व्यंजनों की सुगंध
पाकशाला से

घना जंगल~
दहाड़ से दुबका
मृग शावक

पुष्प वाटिका~
प्रेमी गुनगुनाया
राग भैरवी

रुदन स्वर~
बुजुर्ग के हाथ में
गाय की पूंछ

32. आ. जानकी जीवन प्रधान जी

पंक में धंसे
मजदूरों के पांव~
राग मल्हार 
 
फाग प्रदोष ~
बच्चों की टोली मध्य
दादा के गीत 

बसंत सांझ~
जहाज की छत पे
प्रेमी युगल

वट की जटा ~
खलबत्ते से आई
औषध गंध

श्रावणी भोर~
बया नीड़ से गूंजा 
चूजों का स्वर 

श्रावणी तीज~
विधवा  के हाथ में 
पिया का चित्र 

वीरान राह ~
लाल जोड़े में खड़ी
नवयौवना

कानन पथ~
वृद्धा के आंचल से 
आम की गंध

जीर्ण महल ~
बेटी का तन ढके 
दुशाला से मां
   
आषाढ़ साँझ~
मछुआरे के हस्त 
नन्ही पादुका 

33. आ. ज्योति बिष्ट "जिज्ञासा" जी

संध्या लालिमा ~
गोरैया की चोंच में 
सूखे तिनके

भोर की लाली ~
सरोवर के मध्य 
हंसों का जोड़ा 

प्रेम दिवस ~
पुल नीचे लाश पे 
युवती रोए 

सर्द प्रभात --
कुम्हार के हाथ से
लहु टपका 

गोधूलि बेला ~
पिता के गले लगी 
बालिका वधू। 

कृमि दिवस ~
देहरी पर बैठी 
रुग्ण बालिका। 

भोर लालिमा ~
मंजरी पे झूलती 
चींटी कतार। 

बर्फीली राह ~
भेड़ बकरी संग 
पहाड़ी बाला। 

बरखा भोर ~
नदी मध्य टीले पे
मृत शावक। 

रुदन स्वर~
दीपक प्रकाश में
वस्त्र सिले स्त्री। 

34. आ. डाँ. जितेन्द्र कुमार मिश्रा जी

माघ सवेरा --
मकर संक्रांति में
पतंग उड़ा

चांदनी रात--
प्रियतमा के गोद
प्रितम लेटा।

पूस की रात--
पुआल के घर में
सोता किसान।

कड़ाके ठंड --
रप्फु के कपड़ों में
लेटा मदारी।

विरह पल 
झींगुर की आवाज़ --
शरद ऋतु

क्रीड़ा मैदान–
आखरी गोल पर
माँ का चीत्कार

सुबह बेला--
वृद्ध पड़ा स्टैंड में
मरणासन्न।

पकी फसल--
बेटी की विदाई में
भीगे नयन।

घना कोहरा--
बिड़ी सुलगा रहा
बूढ़ा किसान।

वृक्षारोपण--
चलती बस छोड़े
दूषित हवा ।

35. आ. डीजेन्द्र कुर्रे जी

माँ ने पकायी
पालक आलू रोटी~~
दाल की गंध

सूर्य कांति का
प्रतिबिम्ब जल में ~
खिला कमल

गीली युवती
पानी की फुहार में ~
इंद्र धनुष

भ्रमर गूँज --
विधवा और बच्चा
कपास खेत 

रात रानी की
खुशबू कमरे में~
लोरी गाती माँ

पत्ते से गिरी
पानी बूँद झील में --
भेक की कूद

गन्ने का खेत~
बिल्ली के पंजे दबी
चूहा का बच्चा

अंत्येष्टी कर्म ~
साहिल में माता की
फोटो पे माला

चांदनी रात--
उसके स्मरण में
रात्रि पहरा

शीत की रात~
गुड़दाना व तिल
टेबल पर

36. आ. तेरस कैवर्त्य'आंसू' जी

पक्षियाँ झुंड
भूरी जमीन पर~~
दाने व जाल ।

केले के पत्ते
चार कोने लटके~~
अंतिम यात्री।

वन में ठूंठ~
कुल्हाड़ी की धार में
बैठी चिड़िया।

बच्चों की टोली
संकरी द्वार पर~
चौखाट गिरी।

आखिरी सांस --
बगुला की चोंच में
नन्ही मछली 

घर विरान~
शाख में बंदर व
मधु का छत्ता।

प्रेमी प्रेमिका
सुनसान गली में~
ठंड की रात।

बिहड़रण्य --
फाँसी पर लटके
प्रेमी युगल ।

धुँआ आरंभ~
बाड़ा पास भट्ठी में
बिल्ली के बच्चे

पेड़ की छांव
बीच चौराहे पर~
लाल सलाख।

37. आ. तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे जी

जलता शव
आॅनर किलींग का -
बाप लापता 

गीत अधूरा - 
कलम में आँसू की 
बूँद टपकी  

इत्र महक~
कागजी फूल पर
भ्रमर बैठा

कुहू बाग में -
पूले से पोंछती माँ 
स्वेद माथे का 

लालिमा नभ~
पोपट का समूह
सूखे दरख्त ।

फूल पे भौंरा- 
घुंघट की ओट से 
मुस्काई गोरी 

मुर्गे की बाँग- 
सखी ने सरकाई
सजन हाथ।

जलप्रपात- 
सूखी टहनी पर
बैठा विहंग।

विद्युत गुल- 
सिग्नल के निकट 
फूलों की गंध।

रइयाँ स्वर - 
आँखों में हाथ रखी
रोती औरत।

38. आ. तोषण धनगंइहा जी

पंक का फूल
सरोवर के मध्य --
चांद का बिम्ब

चाँदनी रात-
मैदान पर फैली
ओस की बूँदे।

अभयारण्य--
चहचहाते पक्षी
पंजर बंद।

अमा की रात--
टिमटिमाते तारे
नदी के मध्य।

श्रावणी संध्या - 
लिफाफे में राखी पे
भाई के आँसू

धान का खेत~
जाल में पंछियों की
चिचियाहट।

बंसी की तान~
बाम्ब वृक्ष को ताके
ग्रामीण युवा।

नर्सिंग होम~~
प्रसूति कुतिया के
रुदन स्वर ।

डोलची होली~~
नव वधू के सिर
जलता दीप ।

बाँस जंगल~~
बनशोर घर में
टोकरी छाज ।

39. आ. देव टिंकी होता जी

दीप प्रदीप्त --
कुम्हार की चक्की पे
दीमक लेप ।

प्राचीन गुफा --
पाषाण पे अंकित
हल व बैल ।

मीना बाजार~
गुब्बारे संग साँस
बेचता वृद्ध ।

वर्षा समाप्त~
धूल रहे दो दिल
शैल में छपे ।

चौथ का चाँद~~
वीडियो कॉलिंग पे
पति दर्शन।

तूफान थमा ~~
सलिल में हिलती
वृक्ष की छाया ।

धूप की गंध ~~
दीवार पे अंकित
हथेली छाप ।

मेंहंदी पर्ण ~~
हथेली संग धुले
पिया का नाम ।

सीमांत रेखा ~~
तिरंगे से लिपटा 
श्वान का शव ।

हरितालिका~~
कलाई पे खनकी
शंख चूड़ियाँ ।

शीत लहर~~
कृषक की रोटी पे
टपका स्वेद ।

पूस की रात~~
धान से वाष्प उड़े
आलिंजर के ।

मूँछों में ताव
देने लगा व्यापारी ~~
प्याज समाप्त ।

40. आ. दीपिका पाण्डेय जी

नजरबट्टू~
शिशु के कर बँधे
हाथी के दाँत।

फर्श पे बिच्छू~
चारपाई पे बैठी
दृष्टिहीन माँ।

सूर्य ग्रहण~
शुष्क तुलसी दल
बिलोके वृद्धा।

दावानल में
कंगारू का समूह~
शिशिर रात्रि।

बंदूक ध्वनि~
मुर्रे तट पे खड़ा
ऊँट का झुंड।

अन्नभूमि/कृषिभूम में
वज्रशल्क की हड्डी~
दीमक बांबी।

गेंदी मेले में
स्वाळ पक्वड़ गंध~
अंतिम सेख/पौष।

तोरणद्वार~
मृत सांड को घेरे
चूलो समूह।

चौका से फैली
सेठौरा की सुगंध~
शिशु देहान्त 

मृत चूहे की
पूँछ पकड़े शिशु/बाल~
द्वार पे बिल्ली।

41. आ. धर्मेंन्द्र सिंह "धर्मा" जी

मेघ गर्जना~
सुंदरी के हाथों में
सूरजमुखी

शुष्क धरती~
हाथों में हल लिये
वृद्ध कृषक

आर्द्र वसुधा~
पपीहों की आवाज़
खेतों में गूँजी

वैशाख भोर~
सुग्गा मुँह में लिये
गाजर अंश

पीली किरणें~
हिमालय चोटी पे
पर्वतारोही

सांध्य लालिमा~
परिजनों के बीच
हँसी-ठिठोली

शीत लहर~
खेत के मुहाने में
वृद्ध कृषक

श्रावण साँझ~
झूले पर सखियाँ
खिलखिलायीं

सरसों खेत~
हाथ से रोटी छिना
कृषक पुत्र

शांत निशिथ~
तिखाल में ढिबरी
टिमटिमाये

42. आ. निर्मल "नीर" जी

घना अरण्य~
फाँसी में लटकती
बिन ब्याही माँ

कुंभ का शोर~
जलती चिता पर
अघोरी पाँव

जुता किसान
बैल संग हल में~
शिशु रुदन

बर्फीली घाटी~
दरख़्तों पर लिखे
अधूरे खत

सघन वन~
वृक्ष में बाँधे गए
प्रेमी युगल

प्रदोष काल~
मतदान केंद्र पे
बमविस्फोट

जाड़े की रात~
खड़ी ट्रक के नीचे
सोया भिक्षुक

श्मशान घाट~
धूनी रमाये बैठा
अघोरी बाबा

अरूणोदय~
सूखे पत्ते से झरी
ओंस की बूंद

खुला मैदान~
रेत पर उकेरी
मानव कृति

43. आ. नीतू ठाकुर जी

पग आहट...
डायरी में छुपाया 
अधूरा  गीत

लकड़हारे
वृक्ष की पनाह में-
रिक्त बावड़ी

बीहड़ वन-
पत्नी के कंधों पर
दिव्यांग पति।

शराब गंध~
दूल्हे के गाल पर
हाथ का छाप

बिजली गुल-
कटोरी में घूमते
मक्के के दाने

रात रानी की
गंध फैली बाग में --
पायल ध्वनि।

अजान ध्वनि-
मजार की चादर
ओढ़े भिक्षुक

खाली पालना  
चूमता वृद्ध जोडा -
बाल दिवस

छेनी की नोंक
अधूरी मूर्ति पर-
हथौड़ा नाद

रंग पंचमी /धरा पे रंग-
खिड़की से झांकती
विधवा बहू

44. आ. निधि सिंघल जी

चंद्र रजनी~
पिया संग ‍खेलती
चौपड़ पासा

ज्येष्ठ मध्यान्ह --
कुएँ पर पहरा
जमींदार का

विटप छांव~
दादा की पीठ पर 
बच्ची मुस्काती।

स्कूल वाटिका~
पत्तों से अधढँका
विक्षत शिशु।

श्मशान घाट~
बेटी की चिता संग
पिता की सेल्फी

खेत मचान~
प्रणय क्रीड़ा रत 
शशा युगल

हरीरा गंध~
पिता द्वार ले आए
शिशु का शव

दसरा पर्व~
नीलकंठ का शव
आंगन मध्य

तारों की आभा~
पुस्तक लिए बच्चा
कंदील नीचे 

रंग द्वितीया~
बहन के मुख पे
तेजाब छींटे

45. आ. निधि सहगल जी

वनोन्मूलन-
क्षत डाल पे बैठी
कोयल मूक।

मावस रात्रि-
चमकते झाड़ी में
जुगनू झुंड।

शरद भोर-
तंदूरी रोटी संग
आम अचार।

अक्षय तीज~
टूटे शीशा समक्ष
बाल विधवा

फुटपाथ पे 
वृद्ध के हाथ झाडू~
पीक का स्वर

ज्येष्ठ मध्याह्न~
पुदीना की महक
गन्ने रस से

शुष्क धरती~
कृषक मुख पड़ी
वर्षा की बूंदें

46. आ. पम्मी सिंह "तृप्ति" जी

सब्जी बेचते
पटरियों पे लोग --
रेल की सीटी

डाल पात पे
बूंदों की थिरकन-
राग मल्हार

नदी किनारे
बाट जोहती गोरी-
बाढ़ में शव

हाथ में फोन --
किताब कचरे में
दीमक लगे

आँखों में ख्वाब
पिया की सज रही-
मेंहदी रस्म।

चौकड़ी जमी 
आम के बगान में- 
कजरी राग।

प्राची में उषा --
निकलता कोहरा
खपड़े छत

सोंधी खूशबू --
बिजली तारों पर 
लटकी बूंदें

खिली धूप में
वर्षा की रुन झुन -
ड्योढ़ी पे गोरी।

धूंध को चीर
गुज़र रही रेल-
स्याह बादल।

47. आ. पल्लवी गोयल जी

धुम्र बादल ~
ताल जगमगाये 
दीप अवली 

शीत यामिनी ~
डोलती लौ के पास
बूढ़े दम्पत्ति।

सर्द गोधूलि~
बाल वृंद के माथे
स्वेद व धूल

घन सघन ~
पत्ते पे डोले कीट 
छोर पकड़े

मातृ दिवस  ~
आश्रम पर वृद्धा
गठरी थामे।

ग्रीष्म मध्यान्ह ~
पीली दरार पर 
जल फुहार।

शीत का सूर्य ~
हिमकण टपका
जलप्रपात ।

अश्विन भोर~
द्वार पे रंग भरे
गुलदाउदी। 

ग्रीष्म मध्यान्ह  ~
तवे की रोटी लिया
कपि ने मुँह । 

जल प्रपात  ~
बहे लट्ठे पे  बैठा
सुग्गे का बच्चा ।

48. आ. डाँ. पुष्पा सिंह "प्रेरणा" जी

शिला का टापू--
नवयौवना बैठी
गालों पे हाथ।

यम द्वितीया--
करती सैनिक का
रक्त तिलक।

चैत की धूप~
रस्सी पर चलती
नट बालिका।

मृग शावक~
घनी झाड़ियों से
सिंह की चाप।

पीपल पेड़~
बगुलों संग लटके
चमगादड़।

मंगलवार~
नून राई से औंछे
रुग्ण शिशु को।

सूर्य की लाली~
शहद के अंजन
लगाती दादी।

कर्पूर गंध~
वृद्धा के बिछौने में
नीम के पत्ते।

ग्रीष्म मध्यान्ह~
मवेशी पिएं पानी
एक घाट पे।

मधुयामिनी~
बिखरे फूल संग
टूटी चूड़ियाँ

49. आ. पूर्णिमा सरोज जी

रेतीला खेत~
मेड़ पर मूर्छित
युवा किसान

रास पूर्णिमा~
कत्थक अंतिम का
सेल्फी ली बाला।

मूँगफल्लियाँ ~
गिलहरी खोदती
सूखी ज़मीन।

बास्ता की गंध ~
अजगर लिपटा
बांस कोपल।

कुहासा भोर ~
लकड़ी सिर पे ली
गांव की बाला।

गिद्धों का झुंड
मंडराता नभ में~
बिगुल ध्वनि।

वृक्ष छाँव में
लकड़हारा सोया~
अग्नि लपटें।

उड़ते पंछी~
भोर के सूरज का
चित्र भीत में।

घृत कुमारी~
दग्ध रुप झाँकती
शीशे में अश्रु।

पहाड़ी पर
निर्झर की फुहार~
टिफिन खुला।

50. आ. पूनम दुबे जी

तुलसी पत्ता --
आंगन में महकी
आम्र मंजरी।

सांझ फुहार--
चहचहाये चूजे
नीड़ डाल पे

घंटी स्वर से
गूँजती पगडंडी --
माँ संग बाला।

शाम आँधियाँ--
चौखट पर बैठी
मां ताके पथ।

मंद समीर --
घर आंगन पड़े
वर्षा के छींटें

ओस की धुंध
उद्यान में सघन--
भोर किरण

कुहासा धुँध --
घने वृक्षों को छूते
जमीं पे घाम

प्रदोष अंत--
घास पे चमकती
ओस की बूंदें

सौंधी महक--
झाड़ियों बीच मोर
पंख पसारे।

गरजे मेघ--
खिड़की में फुदके
कपोत जोड़ा

51. आ. पूजा शर्मा "सुगन्ध" जी

चैत्र अष्टमी~
नवजात बालिका
कूड़ेदान में।

अनाथालय
द्वार पे शिशु रुदन~
अर्द्ध यामिनी

शरद साँझ~
जुगनू का प्रकाश
बाल हस्त पे

चौराहे पर
फटे वस्त्रों में बाला~
मातृ दिवस

हरितालिका ~
श्वेत वस्त्र ऊपर
बिखरी चूड़ी

उपवन में 
पायल की छनक~
अर्ध यामिनी

अर्ध यामिनी~
श्वान उठाया शिशु
कूड़े के ढेर से 

भृत्या हाथ में 
रक्तरंजित छुरी~
अर्धयामिनी

ज्येष्ठ मध्याह्न~
गोद बालक लिये
कन्या रस्सी पे

निर्जन स्थल~
वस्त्राच्छादित शिशु
कण्डोल मध्य

52. आ. पंचानन सामल जी

तेंदु का वृक्ष~
बाला बस्ते में रखी
बीड़ी बंडल।

पहाड़ी पथ~
धान गठ्ठा सिर पे
लिए युवक

घना कोहरा~
बीच चौराहे पर
पार्थिव तन

निर्जन पथ~
फटे वस्त्र लिपटी
बेसुध नारी

वट में मौली~
विधवा के गाल पे
आंसू की धार

शहद गंध~
कीलाल कीट काटी
कपोल पर

ज्येष्ठ मध्याह्न~
खजूर वृक्ष पर
लटका हंडी 

वनरक्षक ~
युवा के कांवड़ से
करील गंध

ज्येष्ठ मध्यान्ह~
अन्धकूप में गिरा
मृग शावक

भोर लालिमा~
अधजले दोने की
ताल में ढेरी

53. आ. बंदना पंचाल जी

छठ का पर्व -
अर्ध्य देती माताएँ
अस्त रवि को

बम धमाका~
सेल्फी लिया डॉक्टर
घायलों संग ।

मन्द समीर -
सोता बालक लिया
हल्की मुस्कान।

पिता का श्राद्ध -
मुरझाए  कुसुम
तस्वीर पर।

कन्या विदाई -
गिन चुका सामान
वर के पिता।

पूस की भोर --
बरतन मांजती
गृह सेविका।

बर्फीली वादी -
जवानों के रक्त से
लोहित धरा।

सांझ की बेला -
चौपाल पे आरंभ
आल्हा की गाथा।

बाढ़ का पानी -
फसल निहारता
बूढ़ा किसान।

इगास पर्व -
उड़द के पकोड़े
बनाती माता

54. आ. बाबूलाल शर्मा, बौहरा जी

फाल्गुनी संध्या~
चने लिए बच्चे के
पीछे किसान

कच्ची सड़क~
ठंठा नीर पिलाए 
पथी को वृद्धा

नीम की छाँव~
बुढ़िया के हाथ में 
रोटी चटनी

शहरी पथ ~
नग्न बाल निहारे
वस्त्रों में स्वान

गोधूलि वेला~
धागे में फँसा शुक 
निहारे नभ

अभयारण्य~
छटपटाया मृग
बाघ सम्मुख

उद्यान पथ~
लात मारे छात्र को
बाला समूह

होली दहन~
रक्त सने हाथ में 
जौ की बालियाँ

चैत्र की भोर~
हरे कपोत मुख
पीपल फल
हरे कपोत---हरियल

बंजर भूमि ~
स्वान को चोंच मारे
टिटहरियाँ

55. आ. मनोरमा जैन "पाखी" जी

फाल्गुन पुनो ~
घर वापिस आया
प्रवासी पति

गुलाब गंध ~
रखा अलमारी में
पुराना ख़त

साँझ ढलते 
माँ जलाती दीपक~
तुलसी चौरा ।

नव विधवा 
पड़े आँखों तस्वीर ~
व्यतीत लम्हें।

बाल अरुण 
बादलों की ओट में~
जल तर्पण 

अलमारी में
चमके स्मृति चिह्न ~
तैलीय गंध 

कटोरा ले के
भीख माँगता बच्चा ~
पंगु पालक

हिन्दी दिवस ~
डाल पर बोलते 
प्रवासी पक्षी 

बैसाखी पर्व ~
लोहडी की मिठाई
वृद्धाश्रम में 

लाकडाउन ~
आजाद हुये पक्षी 
चहचहाते

56. आ. ममता गिनोड़िया "सजग" जी

रात की रानी ~
कुमुदिनी के दल
चाँदनी छूती

बेर की झाड़ी
फलों से लदी हुई --
पंछी बसेरा

लाल कलश
चावल भरा हुआ ~
कैरोसिन बू

सूखी पत्तियाँ --
दवात में दबे हैं
पुराने पन्ने

पेड़ की डाली
झूल रहे पक्षियाँ --
बौराया आम

उमड़े गाड़ी
यातायात व्यस्त --
गायों का झुंड

संगीतमय
गले बँधी घंटियाँ ~
कृषक हाँक 

ज्वलित दीप --
आहूति से सुगन्ध
घीव की फैली

माघ की रात --
चमकने लगी है
मैदानी घास

करवाचौथ~
रात्रि में छत पर
आँख बहाती।

57. आ. मधु सिंघी जी

निसर्ग ओज
बिखरे चारों ओर --
नीर सरोज

भोर की बेला-
सुवर्ण से मंडित
हिम शिखर

हिम पर्वत
अटकायी निगाहें --
प्रथमा दीप्ति

साँझ की बेला--
गंगा मझधार में
जलता दीप

तैरे तैराक
गहरे सागर में--
व्हेल का झुंड

टूटता तारा--
अनाथ बालिका की
पलकें बंद

नदी ऊफान--
पुलिस के काँधे पे
वृद्ध की लाश

दीवाली दीप--
माँ विदेशी पूत की
देखती फोटो

भरी नदिया--
टूटे हुए बाँस का 
झूलता पुल

खुले आकाश
पेंच लड़ाते बाल --
कटी पतंग

58. आ. मनीष कुमार श्रीवास्तव जी

गर्म हवा से
पथिक तन पोंछा--
पेड़ की छाँव

लू थपेड़े में
वो महुआ के नीचे--
सत्तू भोजन

वृक्ष विलुप्त --
कांक्रीट महल से
पक्की सड़क

छिपा हिरण
झुरमुट के पीछे-
सिंह गर्जन

होली के रंग
धरा पर बिखरे -
टेसू के फूल

धुंध मण्डल
आसमान की ओर --
प्रपात ध्वनि।

दस्ता प्रवेश 
परीक्षा भवन में -
बाग में शोर 

भुजंग डेरा
ईंट के चट्टों पर-
बच्चों का घेरा

खेत में खड़ी
पकी हुई सरसों-
ओला बारिस

आँवला नीचे
पारण करती माँ~
द्वादसी भोर

59. आ. माधुरी डड़सेना जी

आम्र मंजरी-
कौए के घोसले में
झाँके कोयल

काले बादल -
उड़ती फुफुंदी को
छूता बालक।

भोर की बेला-
फोन से बज रहा
कुकडुक कूँ

वर्षा की बुँदें
गालों पे चिन्हांकित --
होंठों की लाली

वन उत्सव-
गमलों में सजाये
प्लास्टिक फूल

हवा के झोंके-
पुस्तक में मिला
अधूरा ख़त

ठुमका-ताली
बृहनल्ला की दुआ --
सोहर राग

नौतपा की लू-
नल पास चिड़िया
पड़ी है मृत

कुएँ की खोल
घोसले पास जगा
पीपल पेड़

पूर्ण चन्द्रमा -
प्रेमिका के माथे पे 
प्रेमी का होंट

60. आ. मीना भारद्वाज जी

विटप ठूंठ ~
हड्डियों के टुकड़े 
झील किनारे।

उपल वृष्टि~
दादी ने चूस लिया
बर्फ का गोला ।

संध्या लालिमा~
नन्ही चोंच में दाना
डाली चिरैया ।

भोर का तारा~
पाकशाला से आई
चाय  सुगंध।

भोर लालिमा~
नदी तट पे थामे
अस्थि  कलश ।

फागुन सांझ~
अतिथि के हाथ में
मिष्ठान पात्र।

कानन पथ~
विक्षत शव पर
गिद्ध का झुंड।

भोर किरण~
अमराई में गूंजा
कोकिल स्वर 

नदी का तट~
मांझी की झोपड़ी से
मछली गंध ।

निरभ्र नभ~
क्षितिज छोर पर  
पूनम चाँद ।

कच्ची सड़क~
पेड़ पे चश्मा लिये
वानर शिशु।

शिशु रुदन~
माता कान लगाये
ब्लू टूथ यंत्र

शरद भोर~
माँ का पैर दबाता
नन्हा बालक

61. आ. डाॅ.मुकेश भद्रावले जी

मातृ दिवस --
मना के आश्रम से 
ले आया पोता

सावन भोर --
झूल रही बिटिया
आम्र डाल में

नदिया पार 
आलाप दादरा के --
ढोल पे थाप

नदी में बाढ़ --
करता इंतज़ार
बस स्टाप में

मूसलाधार --
बैठा वर्षों के बाद
बच्चों के पास

प्रेमी के साथ 
वधू रफूचक्कर-
सून्न आँगन

रोगी की मृत्यु --
चिकित्सक बिदाई
पार्टी में व्यस्त

रस्सी पे डाले
गिले कपड़े सारे-
छाए बादल

सूर्य उदय-
मधुशाला में लगी 
लम्बी कतार

चांदनी रात-
आँगन में दादी की
कहानी शुरु

62. आ. मंजू शर्मा जी

बिमार वृद्ध 
रिश्तेदारों से घिरा --
गिद्ध उवाच

निशीथ काल --
गूँजी चक्की धुन में
दुल्हन गाती

आतिशबाजी 
नव वर्ष उत्सव में --
सुलगा चूल्हा 

वर्षा आरंभ --
छत टंगे वस्रों पे 
धूसर चित्र

सजल नैन --
फटी आँचल लगे
स्वर्ण मेडल 

चाँदनी रात --
रेत टीलों के मध्य 
जल लहरें 

सर्दी की रात -
अखबार के नीचे 
सोता बच्चा

शीत काल में
शाल हाट लटके -
नग्न भिखारी 

घर में जश्न -
दादा अकेले तापें 
गली अलाव

वसंत भोर -
कलरव बारी पे 
केलि कपोत

63. आ. यशवंत"यश"सूर्यवंशी जी

उजड़ा बाग~~
घर के द्वार पर 
रंगोली फूल।

पिया मिलन~~
चकोर ताक रहा 
नभ में चाँद ।

धुप सुगंध ~~
माता जला रही हैं
घर में दीप।

रुई के खेत~~
मचान पर बैठा
तोंदक वृद्ध ।

कस्तूरी गंध~~
बच्चे के बदन में
तीव्र गरमी

कचरा डिब्बा ~
खरगोश प्रतिमा 
बाग की शोभा ।

नभ में चाँद ~
युवती के साथ वो
सेल्फी में कैद।

ब्योम में चाँद~~
बालक पानी पड़े
पकड़े छाया ।

बीन की धुन ~~
संग्रहालय रखे
तक्षक नाग।

बिखरी कली 
पड़े झाड़ी के नीचे ~
शिशु के अंश।

64. आ. रश्मि शर्मा "इंदु" जी

शैशव लौ व
कलरव बाग में~
गोदी पे पोता

मद्धिम सूर्य~
चहकते परिंदे
नीड़ पेड़ में

रेशमी धागा
तस्वीर में बाँधती ~
सुमन गुच्छ ।

गोधूलि बेला~
चरवाहे की बंशी
कटिबंध में

झूले पड़े हैं
अमवा की डाल पे ~
सखी और मैं

चौथ का व्रत~
चाँद का प्रतिबिंब
पिया नैन में ।

फूस झोपड़ी~
लोरी गुनगुनाती
झूलाती मैय्या

बरखा संग
बयार थम गयी ~
झील पे पत्ते

आँसू की बूंदें
लुढ़कती गालों पर ~
निर्जन निशा

रास पूर्णिमा~
महका मधुबन
परफ्यूम से

65. आ. रविबाला ठाकुर जी

नदी का तट-
बगुले की चोंच में 
तड़पे मीन।

नदी में बाढ़-
सेल्फी लेते फिसले
प्रेमी युगल।

बच्चों की टोली~
कबड्डी मैदान में
बिजली गिरी।

वकों की टोली
बरगद शाख में --
पटाखा फटा

सरिता तट-
सेल्फी खिंचती बाला
नक्र मुख में।

दीपों की पंक्ति-
बाल्य हाथ में फूटा
एटमबम।

छत में दाना-
बया की टोली पर
बिल्ली झपटी।

नींद में माता-
बालक के पैर में
लिपटा सर्प।

भोर लालिमा ~
वट फुनगी पर
वक युगल

कुहासा भोर~
राजिम तट पर
जन समूह

66. आ. रवीन्द्र सिंह यादव जी

मेघ गर्जन ~ 
चोंच में दाना लिये 
चूजा चिड़िया |

चाँदनी रात ~
सितार की झंकार 
नदी के तट

अर्द्ध-यामिनी~
झरोखे से चाँद को 
निहार रही

सिंदूरी साँझ~
किले की छत पर
वृद्ध दंपत्ति।

नभ में चील~
साँप के पीछे मोर 
नदी किनारे |

बसंत-साँझ-
चिड़िया ने झुकायी 
आम्र-मंजरी |

धान का खेत~
सारस की चोंच में 
दबा केंचुआ |

कुहाँसा भोर~
कागा ने छीनी रोटी 
बाला हाथ से |

फूलों की घाटी~
चीड़ की छाँव तले 
नाचता मोर |

सर्दी की धूप~
रोटी ले बैठा कागा 
मुंडेर पर |

67. आ. राधा तिवारी "राधेगोपाल" जी

चाँदनी रात --
दादा दादी के संग
लुडो का लुत्फ

चंचला द्युति -
वर्षा दरमियान
चाय पकोड़े

नदी का तट~
शहीद कफन में
सुर्ख गुलाब ।

खुला आसमाँ-
मच्छरदानी लगा
सोई बूढ़ी माँ

बिगुल बजा-
जरठ दीर्घदर्शी
शव में बैठा

नदी में कश्ती-
गोताखोर बचाता
डूबती नार

शीत की रात-
गुड़ व मूंगफली
टेबल पर

वन में आग~~
नील गाय का पैर
ग्राह मुख में ।

गमछा ओढ़े
पौधा लगाता वृद्ध-
चटक धूप

ज्येष्ठ मध्यान्ह~
सूर्य को अर्घ्य देते
मां और बेटी

68. आ. राजकांता राज जी

सावन झूला-
सहेलियां मिलके 
गावे कजरी ।

अमावस को
चलता राहगीर -
बत्तियां गुल।

तुलसी पेड़ 
आँगन में महकी -
दवा पुड़िया ।

भीगे अक्षर -
बाल कर्मी बेटे से
मां मांगे पैसे।

रक्षा बंधन-
छत पर रो रहा 
बाल श्रमिक ।

शीतल वायु -
पंजों में दबा उड़ी 
बाज सर्प को।

कमल खिला -
बीच तालाब पर
बच्चे का पंजा

पितर पक्ष --
भोज चुगते कौए
छत पे झूमे

खाना संग्रह-
बेजान कीड़ा हिला 
चीटियों बीच।

बर्षा बौछार-
खेत में बैठे किसान 
भीगे पलकें ।

69. आ. राजेश त्रिपाठी "राज" जी

स्कार्फ लगाए
बैठे प्रेमी युगल ~~
शहरी पार्क ।

दीपमालिका~~
कैंडल लिए बाला
कब्र सम्मुख ।

गोधन जश्न~~
गाय की प्रतिमा में
तिलक भोग।

स्वाती आरंभ ~
चकोर चोंच मध्य
जूगनू आभा ।

सीमांत रेखा~~
पीपल की छाल पे
गोली के चिन्ह ।

कार्तिक अंत ~~
आग से अधढंका
शकरकंद । 

त्रिवेणी स्थल ~~
गोताखोर बच्चे के 
हाथ में अस्थि ।

काष्ठ मूर्ति से 
कुतरन की ध्वनि~
धूप की गंध ।

अरुणोदय ~
स्नानागार में फैली
चमेली गंध ।

पराग दाग
कागजी सुमन पे ~
मर्मर पंछी।

70. आ. राजकुमार मसखरे जी

रुकी बारीश -
बाला की हथेली में 
लटका साँप।

सोहर गाते
आँगन में किन्नर~
मिठाई गन्ध ।

स्वच्छता बोर्ड ~~
कचरे थम गये 
नदी किनारे।

ईद का जश्न~
जय घोष तिरंगा
शर्बत संग 

श्मशान घाट--
बँधा है वृक्ष पर
रेशम डोर।

बिजली गिरी ~
बकरी चरवाहा
वृक्ष के नीचे ।

ओले की वृष्टि ~
किसान पंचायत
गाँव गुड़ी में ।

वृद्धा झुलसे
आग की लपटों से~
शीत लहर ।

इमली खाते
बच्चे बैठे सामने ~
बाँसुरी तान ।

अनेक ठूठ
उजड़े चमन में~
बसन्ती राग ।

71. आ. डाँ. रुनू बरुवा "रागिनी तेजस्वी" जी

करवा चौथ-
एलबम देखती
बेवा युवती

हल चलाता
बैलों संग किसान-
मेड़ में बच्चा ।

पुच्छल तारा --
करबद्ध खड़े हैं
प्रेमी युगल ।

श्मशान घाट~
छिप के जन्म देती
अधेड़ बेवा

चाय बागान ~
श्रमिक करम में
झुमूर नाचे

मल्हार राग~
सूखे खेत में हल
चलाए नर

करवा चौथ~
पति की मौत पर
चिता में कूदी

लोबान गंध ~
कब्रिस्तान में पिता
कोफिन साथ

जलती चिता~
बरसात में खड़ी
विधवा माता

गुलाब कली~
ऊंगली से टपकी
खून की बूंद

72. आ. रोजालिन पुरोहित जी

करील गंध~
कड़ाही पर डाले
जीरे की छौंक 

धनिया गंध~
मूली की क्यारी पर
पानी फुहार 

प्रेम दिवस~
गुलाब पर गिरी
अश्रु के बूँद 

इंद्रधनुष~
गाँव की वीथिका पे
सौंधी महक

रँभाना स्वर~
पैरा कुट्टी यंत्र पे
उँगली कटी

राहर छाँव~
पतीले से महकी
पसिया प्याज

चौथ की भोर~
उलूक स्वर सुन
छूटी डिबिया

ज्येष्ठ मध्यान्ह~
हवा के गेंद पर
साधा गुलेल

राग भैरवी~
मधुकर की गूँज
सरोवर पे

आषाढ़ साँझ~
मृदंग थाप संग
कस्ताल स्वर

73. आ. वंदना सोलंकी जी

गोधन पर्व~
पशु व मानव की
गोबर मूर्ति।

जल का पात्र~
काक गौरैया सङ्ग
स्नान करते

युवा दर्ज़ी के 
स्पर्श से होंठ मोड़ी --
प्रेस की गंध।

कार्बन गैस~
तंदूर की राख में
क्षत हड्डियाँ

ब्रह्म महूर्त~
माँ घर में घूम के 
सूप बजाए।

ग्रीष्म मध्यान्ह~
आम्र के बागान में
मिरिंडा गंध।

संकष्टी चौथ~
माता तिल गुड़ से
बकरा बनाये

ढोलक स्वर~
मधु से ओम लिखा
शिशु जिव्हा पे

मावस निशा~
मच्छरदानी मध्य
दीप्त जुगनू

ज्येष्ठ मन्ध्यान्ह~
मुख में शिशु डाले
मृत भित्तिका 

74. आ. विभा रानी श्रीवास्तव जी

दादा व पोते
खेल रहे लागोरी
बाल दिवस ।

दीपकोत्सव-
दादी ने माँ को सौंपी
थाती का तोड़ा।

भड़भुजनी
भणसार जलाती-
धुंध में रवि ।

उसी कक्षा में
दादी का नामांकन–
बाल दिवस।

दीपकोत्सव-
स्याह अँधेरा फैले
साझे दर पै।

मधुयामिनी - 
संकेतक रौशनी
पर्दे के पास |

रास पूर्णिमा-
चौपड़ पर पड़ी
साले की घड़ी।

विजयोत्सव-
सिंदूर की रंगोली
कुर्ते(शर्ट) पै सजी।

पथ पै गड्ढ़े-
तम में बाँह खींचे
गुरु भुवेश ।

चाल में सर्प
श्रृंग से भू पे जल-
सद्यस्नाता स्त्री।

75. आ. विष्णुप्रिय पाठक जी

राग केदार ~
बिस्तर पे लड़ते
युगल भ्राता ।

अंडे के संग
निकली पिपीलिका~
प्रथम वर्षा

होठ की छाप~
नही धूला मैं कभी
कांच की प्लेट

जल की बूंद
डिंपल में लुढ़की~
आद्रा नक्षत्र ।

पुस्तैनी पत्र~
गूगल के बाहर
पुरानी लिपि।

सूखा दरख्त~
दीमक लगा रहे
 मिट्टी का लेप।

नन्ही गौरैया
आंगन में फुदके~
राग भैरवी।

राग बसंत ~
खड़खड़ाते उड़े
सूखे पल्लव।

गोधूलि बेला~
कलम टटोलते
आँख के वैद्य।

ताजमहल~
गुम्बद से लटका
बया का नीड़।

76. आ. वेद प्रकाश प्रजापति 'वेद' जी

मेघ आहट --
दिन की रानी बीच
मोर का नृत्य

चोंच में दबे
तिनके का टुकड़ा --
अधूरा घर 

स्तब्ध बालक --
परात के जल में
चांद का बिम्ब

साँझ की बेला --
विपक्षी लहरों को
चीरती कश्ती

बया का नीड़ --
लूता फंदा में कीट
झाड़ी के बीच

गौ टीले पर~
चरवाहे की टेर
पेड़ के नीचे

झुंडों में पक्षी --
लिपटा विषधर
नदी किनारे

वन में ठूंठ --
प्रहरी के गले में
चोट निशान

हल का बैल~
किसान की संतान
मेड़ में पड़ा

रक्तिम साँझ~
समुद्र के किनारे
पक्षी का शोर

77. आ. विनोद कुमार जैन "वाग्वर" जी

घना कोहरा ~
खाई के मुहाने पे
गाड़ी पंक्चर

घना कुहासा~
चमका क्षण भर 
गली में बल्ब ।

स्वच्छता बोर्ड~
गली के झोपड़े में 
शौच दुर्गंध

शरद संध्या~
बाला की फटी जीन्स
ताके भिक्षुक

 बासन्ती भोर ~
सजन की याद में
भीगी पलकें

श्रावणी मेघ ~
प्रेमी उपवन में
अधर धरे ।

 घंटी की ध्वनि~
फैक्टरी के सेवक 
सडक पर ।

अक्षय तीज ~
कचहरी में शादी
विधवा सङ्ग ।

आम सड़क ~
दिव्यांग बाला का 
चीर हरण ।

हरित धरा~
कँटीले ठूंठ झुंड 
सड़क तीर

78. आ. शकुन्तला अग्रवाल "शकुन" जी

खेत विभक्त --
वसीयत के लिए
लड़ते भाई

इंद्रधनुषी
रँग कैनवास पे~
नील गगन

जेठ के भोर
तप रही वसुधा~
मीन रेत पे

सूखा गुलाब~
किताबों के बीच में
पिया की फोटो

अनाथाश्रम~
फल फूल रहा है
बूढ़ा दरख्त

शिशु कोख में
लेकर माँगे भीख~
गंगा का घाट

खलिहान पे
ठिठुरता किसान ~
जुताए बैल

शंपा व बाढ़ ~
गांव पे मंडराए
गिद्धों का झुंड

श्वेत साड़ी पे
टँग गया मैडल ~
विरह राग

साँझ की बेला~
पैसे गिने भिखारी
मधुशाला में

79. आ. शेख़ शहजाद उस्मानी जी

आम्र मंजरी
फोन की स्क्रीन पर-
हाथ-मेंहदी

दूज चाँद पे
आधी बात रात में-
अधूरा ख़त

फसल बीच
खड़ा हुआ बिजूका-
कृषक-पुत्री

कच्चे चूल्हे पे
रोटी सेंकती बूढ़ी -
धुंध में घर

तेज़ हवा से
घोंसला झूल रहा -
झुग्गी में बच्चे

सूनी सड़क
नौतपा दिवस में -
शिकंजी वाला

हाथ ठेले में
पुत्री-शव लिये स्त्री -
नौतपा-रवि

बच्चों की चीखें
ऊपरी मंज़िल पे -
बिग्रेड भोंपू

कदली स्तंभ
पतित धरा पर ~
अर्थी पे शव

तितली फुर्र --
गजरे से ज़मीं में
पंखुड़ी गिरी

80. आ. श्वेता सिन्हा जी

रक्तिम साँझ~
समुंदर किनारे
जाल के ढेर

झील में चाँद
निहारे प्रेमी जोड़ा~
नौका विहार

इंद्रधनुष~
सफ़र को तैयार
पर्वतारोही

नाचता मोर
झड़े पत्तियों पर~
बूंदों का शोर ।

करवा चौथ --
नीम फुनगी पिछे
चांद निकला

ताल में सर्प~
कौओं की आवाज से
रुका सपेरा

पुष्प में भौंरा~
चित्रांकन करती
नन्ही लड़की

प्रेम दिवस --
पाखी की चोंच दबे
गुलाब फूल

पंक का फूल
मालिन के हाथ में~
रिक्त टोकरी ।

मुर्गे की बाँग~
जूठे कप समेटता
बाल श्रमिक

81. आ. संजय सनन जी

हवा में घुली
आयोडेक्स की गंध...
सेवा निवृत्त

अधूरा चित्र ~~
बारिश में भीगती
नई दुल्हन

मिल का भोंपू ~~
हड़बड़ा के उठा
सेवानिवृत्त

उमड़े मेघ ~~
विधवा के अंगना
गाए पपीहा

भोर की सैर --
धुंध चीर निकली
ग्वाले की घंटी

शव की यात्रा ~~
सामने आ के गिरी
कटी पतंग

कोमा मे सास --
बहू उतार रही
पुश्तैनी हार

मां की बरसी...
पिता मुस्कुरा रहे
फोटो फ्रेम में

पिता की अर्थी...
बेटी की विश लिस्ट
बंद मुट्ठी में

चल बसी माँ --
डाल दी दवाईयाँ
ड्राप बाक्स मे

82. आ. सरोजनी सिंह राजपूत जी

वृद्ध करता
तेंदूपत्ता एकत्र--
ओले की वर्षा ।

पुरानी पेटी--
दादी के वस्त्र पर
चढ़े दीमक ।

पुर्वाह्न काल-- 
नीड़ में चोंच मिले
चुजे पक्षी के ।

चांँदनी रात--
मैकेनिक इंजिन
खोल के बैठा ।

भौंरा गुंजन--
बना रहा है माली
फूलों की माला ।

मेघ गर्जन--
गोद में बच्चा लिए
चाक घुमाती

संदूक खोल
देखे पिया के खत--
करवाचौथ ।

वटसावित्री--
संदुक पर रखा 
लाल चुनरी ।

रक्षा बंधन--
बहन की याद में 
आँसु की धारा ।

नाग पंचमी--
खलिहान पे मृत 
सर्पों का जोड़ा।

83. आ. सविता बरई "वीणा" जी

काले बादल~
किसान डाल रहा
खेत में बीज।

मावस रात~
जुगनूओं के संग
तारे चमके।

धुँधला चाँद-
खलिहान में बैठा
वृद्ध किसान।

चाँदनी रात-
पुस्तक देख रहा
बाल श्रमिक।

नारी दिवस-
झाड़ी बीच बालिका
लहुलूहान।

नभ में बाज -
नदी के तट पड़ा
अधूरा खत।

फसल पर्व-
खलिहान के पास
कृषक शव।

पहली वर्षा-
घर में अंडे लाते
चीटीं के झुंड।

सूखा पल्लव
वृक्ष के नीचे पड़ा-
मृत शरीर।

चांदनी रात-
पति संग सेविका
खींचती सेल्फी।

मृदंग थाप-
किन्नर की गोद में
उचका लाल।

धनिया गंध~
सिलबट्टा उठाती
नन्ही बिटिया

कुहासा भोर~
विडियो बना रही
वैशाखी पे माँ

84. आ. सरिता सिंह "स्नेहा" जी

छोटी सी नाव --
सागर के किनारे
ऊंची लहरे

शरद ऋतु__
पत्ता पर लटकी
ओस की बूंद

धान का खेत ---
पंछी फड़फड़ाती
जाल में फंसी।

नील गगन --
लहरों के ऊपर
उड़ता पंछी।

राग मल्हार---
बहाव विपरीत
बहती नाव ।

पुराना घर ----
यादों से भरी हुई
फटी डायरी।

चैत्र की संध्या --
खिल गयी द्वार में
रजनीगंधा

तेज बहाव --
छप्पर के ऊपर 
लोगों का शोर ।

पुस्तकालय--
दीवार में दीमक
चित्र उकेरी।

बन्दूक ताने
सीमा पर सैनिक---
नम कोहरा।

85. आ. सरोज दुबे जी

गेहूँ की बाली --
सरसों प्रसून में
ओस की बूँद

बसंत काल --
भौंरा गुनगुनाता
कुसुम मध्य

रात की रानी
खुशबू बिखेर दी --
साँझ चौपाल

वट का वृक्ष --
बुजुर्ग चौपाल में
चिथड़े टेण्ट

डाली में फूल -
पंखुड़ी बीच बैठी
तितली उड़ी

नागपंचमीं --
स्वतः ही हिल गया
साँप की बाम्बी

भोर का सूर्य --
चहकती चिड़िया
घोसला छोड़ी

वट का वृक्ष --
कच्चा सुत कातते
माँ और बच्चा

रेत का टीला -
सागर तट फोटो
खीचे सैलानी

कार्तिक साँझ --
रंगोली के ऊपर  
जलता दीप।

86. आ. सरला झा जी

कुहासा भोर-
कानन कंदरा में 
दहाड़ गूँजा।

भोर की सैर --
छाती को थामकर
कराहे वृद्ध ।

कुहांसा भोर --
हाथों में हाथ डाले
नव दंपत्ति ।

भोर लालिमा-
सरोवर में खिला
श्वेत कमल ।

रक्तिम साँझ-
पगडण्डी धूल में
गौ पदचिह्न।

ग्रीष्म की साँझ~
वीथिका में धूल से
सना पथिक ।

तवा पे चीला--
सिलबट्टा से धन्नी
पुदीना गंध ।

तारों की आभा--
दादी किस्से शुरु की
छत पे बैठी।

भोर लालिमा--
पगडण्डी पे गूँजी
बैलों की घण्टी

शरद भोर--
अम्मा मली जोड़ों में 
राई का तेल

87. आ. सरोज साव जी

रेत के टीले~
चमगादड़ नोचे
बालक शव ।

नीलकमल~
रश्मियों से तालाब 
जगमगाता।

निरभ्र भोर~
इंद्रधनुषी छटा
हिम गिरि में।

बच्चों की टोली~
झरबेरी सुगंध
उपवन में।

अर्ध्दयामिनी~
मुँह फुलाए वधू
झरोखे पास।

ज्येष्ठ की संध्या ~
ढाबा से बाग ताके
बाल श्रमिक।

हिम श्रृंखला~
यात्रियों भरी बस 
खाई में गिरी।

ज्येष्ठ मध्याह्न~
पंछी चोंच डूबोयी
झील कीच में 

शरद संध्या~
मोटर के कुत्ते को 
निहारे बच्ची।

शरद भोर~
कमल फूल सह 
तैरे सारस।

88. आ. साधना मिश्रा जी

गुजरे कल --
किताब बीच दबी
सूखी पँखुरी

पितर-पक्ष~
एकाक्षी ताक रहा
दुधिया भात।

पितर-पक्ष~
बिमार माता-पिता
वृद्धाश्रम में।

करवाचौथ~
पिय के नयनों में
चंद्र-दर्शन।

कार्तिक साँझ~
मीनार पे झुलता
आकाश दीप।

चाँदनी रात~
छत की मुँडेर पे
प्रेमी युगल।

पाकशाला से
मछली की सुगंध~
द्वार पे कुत्ता।

बासंती साँझ~
सेल्फी लेते युगल
सरसों बीच।

आधी रात को
घुँघरू की झंकार-
सूनी हवेली।

मुख कैंसर--
रजत के पात्र से
व्यंजन गंध।

89. आ. सुकमोती चौहान "रुचि" जी

सौंधी महक~
तन मन समाये
नम हवायें।

चने खेत में
चमक रहे ओस~
प्रभात काल।

वर्षा समाप्त-
जाल बुने मकड़ी
धान पौधे में।

श्रृंगार पेटी-
गौरैया शीशे पर
मारती चोंच।

पीपल पात- 
बकरी झुँड पर
वृक का वार

अंधेरा कक्ष-
रवि रश्मि झिरी से
दर्पण पर

मध्यान्ह काल--
लुहार के आवे में
सुस्की की गंध

कुहू के स्वर--
आम की केरी पर
नमक मिर्ची

ग्रीष्म की साँझ--
माँ गोखरू निकाले
अजा पूँछ से

माघ में मेघ-
कमरे से आ रही
खट्टाई गंध

90. आ. स्नेहलता "स्नेह" जी

कूड़े का ढ़ेर~
नवजात शव को
घूरे कुकुर

घोड़ी पे दूल्हा~
सड़क मध्य पड़ा
कुत्ते का शव

वानर झुंड~
केले के छिलके पे
फिसला युवा

हिना सुगंध~
जूड़े में स्त्री लगाये
रजनीगंधा

भोर लालिमा~
वृद्ध मुख लगाये
ताँबे का लोटा

किरासन बू~
बुजुर्ग के काँधे से
फिसली बोरी

नदी का तट~
रूमाल से नासिका
ढाँके युवक

प्रेम दिवस~
दैनंदिनी से गिरा
सूखा गुलाब

गाँजा महक~
लोहे की भट्टी पर
गिरा युवक

प्रसूति कक्ष~
ताली आवाज संग
नयन नीर

91. आ. डाँ. सुशील शर्मा जी

धान की बाली-
बिजली खम्बे पर
युगल तोता।

रक्तिम साँझ --
धूल उड़ाती गायें
पगडंडी में

इंद्रधनुष --
नदी किनारे दोस्त
खींचता फोटो

ठूंठ की छाप--
आरी की आवाज से
गूँजता वन ।

लोहित साँझ--
बालक के होंठो से
बाँसुरी धुन।

कागजी कश्ती--
तिनके पर बैठे
टिड्डा व चींटा

पीत आकाश--
मकई के खेत में
हारिल चुगें।

सुर्ख गुलाब--
मुन्नी की चोटियों में
तिरंगे फीते।

फूलों की माला--
सैनिक शव पर
 बिलखती माँ।

वट की छाया--
टूटे ब्लैक बोर्ड में
बारहखड़ी।

92. आ. सुशीला जोशी जी

लौकी की बेल
बिटौड़े पर फैली--
लटके तुम्बी।

भू-स्खलन से
लुढ़क गयी शिला--
घाटी में गाड़ी।

बादल देख
किसान मुस्कुराया--
ओलों की वृष्टि।

सूरज लगा
समंदर किनारे--
नाव अटकी

मीन उछली--
झील सतह पर
खिला कमल।

गिरि के पीछे
उग रहा सूरज--
सुर्ख आकाश।

होटल बाजू
उठ रही दुर्गंध--
अन्न गोदाम।

बसन्ती वर्षा
चैरी के फूलों पर--
पवन शोर।

श्याम नभ में
कड़कती बिजली--
तूफान थमा।

खेत मुहाना--
बदन में उभरे
स्वेदों की बूँदें।

93. आ. सुधा देवरानी जी

ठूंठ झंखाड़~
झरोखे में चिड़िया
तिनका दाबे

मावठ भोर~
फटी बंडी की जेब
टटोले वृद्ध।

ज्येष्ठ मध्याह्न~
गन्ने लादे नारी के
नंगे कदम।

कर स्पर्श से
लाजवंती सिकुड़ी~
गाँव की राह।

गोश्त की गंध~
बालिका की गोद में
लेटा मेमना।

 श्रावण सांझ~
दलदल में फंसा 
हाथी का बच्चा

गृह प्रवेश~
दरवाजे पे टंगी
नींबू मिरची

 चारणभूमि~
महिषी की पीठ पे
बैठा बगुला

चैत्र मध्याह्न~
बेटी के सासरे में
कलेवा भेंट

हरीरा गंध ~
बीमा पत्रक पर 
पुत्री का नाम

94. आ. सुधा सिंह 'व्याघ्र' जी

प्रेमी दिवस~
सूनी डगर ताके
नवयौवना।

जेष्ठ मध्याह्न-
खलिहान से उठी
लपटें धुआँ

चैत्र अष्टमी --
स्त्री का जला पार्थिव
पुल के नीचे

अँधेरी गली
नोटों की गड्डी लिया
हवलदार

साँझ कुहासा~
झींगुर आवाज से
गूँजा जंगल

संक्रांति भोर-
घायल पक्षी गिरा
वधु अंक पे

चैत्र नवमी~
कन्या किलक पर
प्रसूता रोई

सूनी सड़क~
शिकारी के सामने
मृगशावक

गुरु पूर्णिमा-
दारोगा के सामने
शिक्षक छात्र

पितर पक्ष-
लेटे श्वान के आँसू
समाधि पर

95. आ. सुषमा शर्मा जी

मांँस लोथड़ा
कुक्कर जबड़े में -
दहाड़ स्वर।

पछुआ हवा -
तूफानी लहरों में
फंँसा नाविक।

चैत्र पूर्वाह्न -
सरसों फसल पे
झुण्ड में चैंपा।

माघ चतुर्थी~
बाजरे की टिक्की से
गुड़ सुगंध।

दीप प्रकाश -
छिपकली मुख में
दबा मच्छर।

मार्च आरंभ~
लिये हाथ लेखनी 
सिर पे काॅपी

केला फसल -
युगल पात बीच
गौरैया नीड़।

ग्रीष्म मध्याह्न -
मटके के निकट
चिड़िया स्वर।

सांध्य लालिमा -
जहाज आकृति में
चिड़िया झुण्ड।

हिम श्रृंखला  -
अस्थि कलश लिये
वायु सेनानी ।

96. आ. सुमिधाहेम सिदार जी

कपास खेत-
बंजर में पुष्पित
कास के फूल।

दरार भूमि-
खेत मेड़ हरित 
नागफनी से

गाल गुलाबी --
महुआ गंध संग
नगाड़े स्वर

तूफानी वर्षा --
मछुआरे का नाव
हिलकोर में ।

नदिया तीर 
शीतल मंद बयार --
राही नींद में

पतीले पर
महकती चाशनी --
मक्खी का झुंड

रक्त के धब्बे --
प्लेट में अधकटे
प्याज टुकड़े

बंगला पत्ती --
आँगन में रंगोली
विविध पुष्प

इमली पुष्प --
नन्हा पक्षी लटके
उलटे पैर

दूध का झाग --
कोयले में बदला
चूल्हे अंगार

97. आ. सौरभ प्रभात जी

पौष पूर्वाह्न~
दुबका व्याघ्र शिशु
गाय के पास।

अंतिम पौष~
चावल की पीठी से
गुड़ की गंध।

माघ की भोर~
कोलम बनाती स्त्री
तोरण तले।

हिम की घाटी~
अस्थि अवशेष पे
बैठा आरोही

फाल्गुन भोर~
सप्त धान्य पे रखा
ताम्र कलश

सौंधी महक~
शिशु रखे मुख में
कनखजूरा

चौदह जून~
झूले पे स्त्री के हाथ
चाकुली पीठा

स्वालु सुगंध~
दूर्वा अक्षोर देते
वृद्धा को बच्चे

मधुयामिनी~
श्वेत चादर देख
आँखों में लाली

वैशाख भोर~
कनि कोन्ना दिखाता
बच्चे को वृद्ध

98. आ. संगीता गोविल जी

मयूर पंख ~
किताब में रखती
प्रमाण पत्र ।

दीप माला से
रोशनमय गली  ~
तम में झुग्गी।

धुंध में छिपे
मकान और वृक्ष ~
खाली डगर ।

राह में कीट
टकराया शीशे से ~
वर्षा का झोंका ।

शीत की शाम--
चोंच छुपा सीने में 
बैठा कपोत

पके गहूँम~
थाली में रोटी देती
अचार संग।

आँधी से टूटी
डाल और छप्पर ~
रेत का राज।

टूटी सड़क ~
दौड़कर पकड़ा
माता का हाथ ।

ढँके चूजों को
पक्षी बैठे नीड़ में ~
ओले की वर्षा।

गवाक्ष पर
बालक लिखा नाम~
शीशे में ओस।

99. आ. क्षीरोद्र कुमार पुरोहित जी

चंद्र उदय ~
घुंघराले जुल्फों में
गोरी का मुख

दसरा पर्व~
नीलकंठ का चित्र 
देखते लोग 

दीप उत्सव ~
देहरी की रंगोली
वर्षा से धूली।

कार्तिक रैन ~
पलंग में महकी 
हरसिंगार

घुड़का स्वर~
सिर को गाड़कर 
खड़ा आदमी

बिच्छू का डंक~
साँस के संग रुका
मंत्रोच्चारण

मावस रात्रि ~
नींबू मिर्ची की माला
गृह द्वार पे

चीता की दौड़~
मृगछौना की चीख
वन में गूँजी

मातृ नवमी~
दीवार पर हल्दी
हस्त की छाप 

प्रक्षालक बू ~
दो हजार बीस की
लग्न पत्रिका 

Wednesday, 9 September 2020

हाइबन सीखें, आद. ओमप्रकाश क्षत्रिय जी के शब्दों से...

हाइबन:एक परिचय
ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश'

        हाइबन एक जापानी विधा है। इसमें हाइकु के साथ साहित्य की अन्य विधा का गठजोड़ होता है। पहले साहित्य की अन्य विधा को लिखा जाता है। इसके अंत में एक हाइकु होता है। इसके संयुक्त रुप को हाइबन कहते हैं। संक्षेप में कहें तो किसी भी विधा में प्रकृति की व्याख्या अथवा रचना के बाद या रोचक विवरण के बाद अंत में एक हाइकु की रचना की जाती है। इस रचना को  हाइबन कहते हैं।
इसके प्रथम भाग में डायरी, संस्मरण,लघुकथा, संक्षिप्त कहानी, यात्रा वृतांत के रोचक प्राकृतिक तथ्य, प्रेरक पूरक, गद्य की रोचक व संपूर्ण रचना अथवा प्रकृति का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया जाता है। दूसरे भाग में 17 वर्णोँ  में अपनी बात नियमों के तहत रखनी होती है। इन 17 वर्णों में प्रथम पंक्ति में पांच वर्ण होते हैं । दूसरी पंक्ति में 7 वर्ण और तीसरी में फिर 5 वर्ण होते हैं। इस तरह हाइकु की रचना की जाती है। मसलन -

तोरणद्वार~
सेल्फी लेते फिसली
नवब्याहता।

हाइकु में दो वाक्य होते हैं। इसमें दो बिंब का समावेश होना अनिवार्य शर्त होती हैं। दोनों बिंब दर्शनीय हो । वह आंखों के सामने स्पष्ट नजर आए । अर्थात फोटो खींचने की तरह वह दृश्य आंखों के सामने स्पष्ट दृष्टिगोचर हो जाए । इसका सीधा मतलब यही है।
हाइकु के दोनों वाक्य स्वतंत्र होते हैं। प्रथम या अंतिम पांच वर्ण में क्रिया नहीं होनी चाहिए। किसी प्राकृतिक चीजों का वर्णन इसकी अनिवार्य शर्त है। जिससे उसका बिंब आंखों के सामने दृष्टिगोचर हो जाए। मुँह से आह और वाह निकल जाएं।
दूसरे भाग में 12 वर्णों में दूसरा बिंब खींचा जाता है। यह प्रथम व द्वितीय अथवा द्वितीय व तृतीय पंक्ति हो सकती हैं। यह पूरा एक वाक्य होता है । इस तरह हाइकु  17 वर्गों में रची गई एक रोचक काव्य रचना होती है। इसमें नियमों के तहत एक सुंदरतायुक्त, संक्षिप्त, बिंबयुक्त काव्य रचना रची जाती है।
एक तरह से यह 17 वर्णों की सबसे छोटी काव्य रचना है। इसमें अपनी बात प्राकृतिक तत्वों के अंतर्गत रखना होती है । इस कारण इसमें कल्पना का कोई स्थान नहीं होता है। आप तुलना नहीं कर सकते हैं । इसमें कोई साधारण वाक्य नहीं होना चाहिए । इस कारण इसमें धार्मिकता का प्रयोग वर्जित होता है।
हाइबन में धार्मिक स्थानों का वर्णन उसके अन्य महत्व के आधार पर किया जा सकता है। इसके अंतर्गत वास्तुकला की बारीकी, उसकी पुरातात्विक महत्व की दृष्टि से दर्शनीय कला, उस की मोहकता  और वस्तुकला संबंधित दर्शनीयता का चित्र खींच सकते हैं । मगर यहां आपको कोई कल्पना नहीं करनी है क्योंकि काव्य की तरह हाइकु में कल्पना करना वर्जित है।
इसमें किसी दृश्य यानी फोटो को शब्दों के माध्यम से पाठकों के सम्मुख 17 वर्णों में व्यक्त कर दिखाना होता है। वह भी सीमित वर्णों में दो चित्र वाले यानी बिंब को साकार करना होता है। इसमें किसी एक 5 वर्ण वाली पंक्ति में क्रिया के उपयोग की मनाही होती है।
हाइकु वर्तमान काल में लिखी जाने वाली काव्य रचना या कृति होती है ।इसके वाक्यों में वर्तमान काल का प्रयोग किया जाता है ।जो सम्मुख हो रहा है या दिख रहा है वही शब्दों में दिखाना पड़ता है । इस कारण इसमें भूतकाल और भविष्य काल की क्रिया की मनाही होती है।
विवरण इस तरह लिखना होता है कि वह दो दृश्य आंखों के सामने उपस्थित हो जाए । इसमें भी दोनों दृश्य में कार्य कारण का संबंध न हो। दोनों दृश्य अलग-अलग हो।मसलन-चूहा भाग रहा है और सांप पीछे आ रहा है। जैसे दो दृश्य आप नहीं दिखा सकते हैं। क्योंकि इसमें कार्य और कारण का संबंध उपस्थित होता है।
एक दृश्य दूसरे दृश्य से पूरी तरह से मुक्त होना चाहिए। दोनों दृश्य एक साथ आंखों के सामने दृष्टिगत हो जाए। इन बातों का विशेष ध्यान रखा जाता है ।उनमें कार्य फल का सिद्धांत लागू नहीं होना चाहिए।
इसके अलावा हाइकु की रचना करने में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना पड़ता है। इसमें प्रकृति का मानवीकरण नहीं किया जा सकता है। दो वाक्य स्वतंत्र होते हैं। इस रचना में शब्दों का दोहराव वर्जित होता है। इस को धर्म विशेष व्यक्ति विशेष के वर्णन से मुक्त रखा गया है। मगर विरोधीभाषी वाक्य लिखे जा सकते हैं। तुकबंदी का प्रयोग पूर्णत वर्जित होता है।
यह विधा पूर्णता प्रकृतिमूलक है। इसी कारण इसमें प्राकृतिक दृश्यों का होना अनिवार्य है ।दूसरे वाक्य में आप अन्य स्पष्ट प्रतिबिंब दर्शा सकते हैं। यही हाइकु की संक्षिप्त विशेषता होती है।
हाइकु लेखन विधा में दो मत प्रचलित है । एक हाइकु को  5,7,5 वर्ण की तुकान्त और सौंदर्ययुक्त भावनात्मक रचना मानते हैं। जिसमें भरपुर कल्पना, मानवीकरण और तुकबंदी के साथसाथ मनोदशा का सुन्दर वर्णन कर सकते हैं। इस काव्य की सब से छोटी रचना में अपनेमन के भावों को उंडैल देते हैं। मसलन- इस रचनाकार की एक रचना देखिए।

शक की सुई~
पंचर कर देती
रिश्तों की गाड़ी।

यह हाइकु के नियमों से मुक्त होकर लिखी गई काव्य रचना है। यानी इस रचना में दूसरे मत वाले हाइकु को प्रतिनिधित्व मिलता है। इस हाइकु में हाइकु  की तरह कोई प्राकृतिक दृश्य नहीं है। केवल 5,7,5 के वर्णों में लिखी गई रचना है। मगर भाव का सुंदर समन्वय लिए हुए हैं । यह रचना कई मंचों पर सराही गई है। 
मगर हाइकु के उपरोक्त नियम नियमानुसार नहीं है। इसमें निम्नानुसार दो दृश्य नहीं है । केवल भाव का सुंदर समन्वय है। सुनने में भावोक्ति भरी बेहतरीन रचना है।
हाइकु में दो वाक्यों के बीच विभेदक चिह्न का प्रयोग किया जाता है। इसे अंग्रेजी में कटमार्क कहते हैं। इससे दो वाक्यों को अलग-अलग दर्शाया जाता है । इसे हम दो वाक्यों का विभाजक चिह्न कह सकते हैं।
इस तरह हाइबन में जिस बिंब या दृश्य की प्रथम भाग में रचना करते हैं उसे दूसरे भाग में हाइकु के रुप में लिख कर दृश्य रुप में साकार करते हैं। अंत में हाइकु नियमानुसार हाइकु विधा में लिखा जाता है। हाइबन के प्रथम भाग में कोई व्याख्या, रोचक वर्णन, लोककथा, लघुकथा, प्रेरक प्रसंग, दृश्य या कोई विवरण होता है । उसके बाद अंत में हाइकु की रचना की जाती है। इस संपूर्ण रचना को हाइबन कहते हैं। हाइबन लिखने में आपको पद्य और गद्य लिखने में माहिर होना पड़ता है। तभी यह प्रभावी बन पाता है।
इस रचनाकार का एक हाइबन देखकर आप इसे अच्छी तरह समझ सकते हैं । इस हाइबन का शीर्षक है- नभ की छवि । इसके द्वारा आप हाइबन को और स्पष्ट रूप से समझ पाएंगे।

हाइबन---नभ में छवि

         आठ वर्षीय समृद्धि बादलों को उमड़ती घुमड़ती आकृति को देखकर बोली, " दादाजी ! वह देखो । कुहू और पीहू।" और उसने बादलों की ओर इशारा कर दिया।
बादलों में विभिन्न आकृतियां बन बिगड़ रही थी, " हां बेटा ! बादल है ।" दादाजी ने कहा तो वह बोली, " नहीं दादू , वह दादी है।" उसने दूसरी आकृति की ओर इशारा किया, "  वह पानी लाकर यहां पर बरसाएगी।"
" अच्छा !"
" हां दादाजी, "  कहकर वह बादलों  को निहारने लगी।

नभ में छवि~
दादाजी को दिखाए 
दादी का फोटो।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
01-09-2020
ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश', पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़, जिला-नीमच (मध्यप्रदेश)-458226

हाइकु विश्वविद्यालय

Friday, 14 August 2020

काल्पनिक पात्र पर विशेष चर्चा...

आ. Jaishree Panda जी:

विधा : हाइबन

     आज मैं आप लोगों को जो बताने  जा रही हूं वह सत्य  व आश्चर्यजनक घटना है, परन्तु आज के वैज्ञानिक युग में यह बात   विश्वास से परे है परन्तु सत्य है।‌‌।
                  आज से लगभग 8-10 साल पहले की बात है जब भैया महासमुंद जिले के सरायपाली ब्लॉक के एक छोटे से गांव "कनकेवा" में रहते थे। जेठ का महीना था।भयंकर गर्मी थी शाम को नहाए बिना रहा नहीं जा रहा था। एक दिन भैया किसी काम की वजह से शाम को तलाब नहाने नहीं जा सके और रात हो गई।करीब 9-9:30 बज गए। और गर्मी की वजह से बिना नहाए रहा भी नहीं जा रहा था इसलिए वे तलाब की ओर चल पड़े।तभी रास्ते में उन्हें एक-दो वयोवृद्ध जो बाहर बैठे थे उन्होंने मना किया कि इतनी रात को तलाब न जाएं। पर भैया को भूत-प्रेत पर विश्वास नहीं था इसलिए वे नहीं माने।जब वो तलाब पहुंचे तब वहां एक-दो लोग पहले से मौजूद थे।जो नहा चुके थे और वापस आ गए । फिर भैया तलाब में अकेले हो गए । फिर हुआ यूं कि उन्हें दूर तालाब के बीचों बीच एक बड़ा जानवर सा दिखाई दिया। वो फिर भी नहीं  डरे और नहाने काउपक्रम करने  लगे फिर क्या था बड़ा सा जानवर तुरंत उनके पास आकर खड़ा हो गया और अचानक ही उनके मुंह से एक डरावनी चीख निकल गई। और वो बिना नहाए ही वापस आ गए।दूसरे दिन जैसे ही यह बात गांव वालों को पता चली सबने कहा कि हम आपको इसलिए रात को जाने से मना कर रहे थे । तालाब में महिषासुर रहता है।  ‌‌

अर्द्ध यामिनी~
सरोवर पे खड़ा
महिषासुर

जयश्री पंडा

आ.Kumkum Purohit जी: 👌👌 सत्य घटना पर रचित बेहतरीन हाइबन

आ.Jagat Naresh जी: गद्यांश में धार्मिक झलक रहा है आदरणीया 
: जी ये सत्य हो सकता है। बेहतरीन संस्मरण का समावेश हाइबन में : परंतु यहाँ अर्द्ध यामिनी उपयुक्त नहीं लग रहा : आपके गद्यांश कुछ और ही कह रहा है

आ. Jaishree Panda: जी।प्रदोष काल करें क्या

आ. ममता जी: मैं तो पढकर ही डर गयी और सामने कोई ऐसे आता है तो पर सुना हुआ है रात को नदी तालाब मे नही जाना चाहिए

आ.Jaishree Pandaजी: जी अर्ध्द यामिनी को कोई  सरोवर पे कोई नजर नहीं आएगा। जी सखी।ये बिल्कुल सत्य घटना है।

आ. Runu G: अद्भुत 👌👏👆👏

आ.Jaishree Panda जी: आभार सखी

आ. Deepali जी: ऐसा भी होता है।पढ़कर डर लगा

आ. ममता जी: वो बच गये यह एक बहुत बड़ी बात है अन्यथा वहां इतनी रात कोई होता है जो पैर खिंच लेता है यह भी सही बात कहती हूं

आ.Jagat Naresh जी: क्षमा... महिषासुर काल्पनिक है। परंतु सभी के मान्यतानुसार विचार-विमर्श के पश्चात् इस कृति पर निर्णय लेंगे।

आ. ममता जी: हां महिषासुर नही होता है बहुत लोग प्रेत व जिन्न का नाम भी नही लेना चाहते है शायद
आ. Runu G: अरे हाँ .... काल्पनिक बात पर तो ध्यान ही नहीं गया! यह मान्य नहीं है न!
आ.Jaishree Panda जी: जी आदरणीय।पर ये गाँव वालों द्वारा दिया गया नाम है।
आ. Jagat Naresh जी: जी आदरणीया... यदि हम सभी इस तथ्य से परिचित हैं तो मान्य दे सकते हैं। क्योंकि सच्चाई छुपाने से हम प्रकृति से जुड़े सभी तथ्य सामने नहीं ला पायेंगे। इसके बारे में आप सभी लिखें कि इसको अंधविश्वास करार देकर वास्तविकता से मुँह क्यों मोड़ा जाता है।

आ. ममता जी: यह अंधविश्वास नही है क्योकि इस तरह की दुसरी घटना हुई है असम के तिनसुकिया मे

आ. Runu Barua जी: सर्वप्रथम 'हाइबन 'में कल्पना का क्या स्थान है, स्पष्ट कीजिए ।
दूसरे  ' महिषासुर ' काल्पनिक पात्र है या धार्मिक लौकिक कथा का पात्र । यह सब शोध का विषय है । अतः ऐसी स्थिति में रचना को हाइबन में स्थान मिलेगा या  नही! मेरी  समझ में अगर राम, कृष्ण,  सीता को आप हाइबन में स्थान देते है तो महिषासुर को भी दीजिए ।

आ. Jaishree Panda जी: इसे महिषासुरकहें,ब्रह्म राक्षस कहें,भूत पिशाच कहें याकुछ और।।। घटना तो सत्य है।बाकी सभी गुणी जन जैसा उचित समझें।

आ. Jagat Naresh जी: हाइबन में दो भाग हैं। एक गद्य और दूसरा पद्य... गद्य में सभी अलंकार (धार्मिक छोड़कर) मान्य हैं। जबकि पद्य में नहीं।

आ. Anant Purohit जी: यह महिषासुर और जेएनयू के महिषासुर में अंतर है आदरणीया 

रही बात हाइबन में स्थान मिले या न मिले उपरोक्त गाँव के लोग उसे महिषासुर ही कहते हैं।

आ. Runu Barua जी: अर्थात गद्य में विषय को समझाने हेतु कल्पना, मानवीय करण,  अलंकार मान्य है परन्तु पद्य में नहीं । इसे आप हाइकु से जोड़ कर देख सकते है । हाइकु में भी यहीं प्रतिबंध है। अतः पद्य और गद्य को लिखते समय इन तत्वों को ध्यान में रखना उचित होगा ।

आ. Jagat Naresh जी : इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए, अंतिम फैसले तक लेने में सहयोग करें
 
आ. Anupama Agrawal जी : सत्य घटना पर आधारित एक बहुत ही सुन्दर कृति है ये।परंतु इसके पद्यांश में  मुझे दो बातें खटक रही हैं।एक तो समय।जैसा कि गद्य में बताया गया है उसके अनुसार रात्रि 9 -9:30 का समय प्रदोष काल नहीं कहलाता है।उसके स्थान पर यदि हम *रात्रि आरंभ* या फिर *ग्रीष्म निशीथ* ऐसा कुछ करें तो संभवतः ज्यादा उचित होगा।
और दूसरी विसंगति जो नज़र आ रही है वो है *महिषासुर* शब्द का पद्य में प्रयोग।भले ही स्थानीय लोग उसे इसी नाम से जानते हों परंतु महिषासुर एक काल्पनिक पात्र है और कल्पना हाइकु के नियमांतर्गत मान्य नहीं है।अतः मेरे विचार से यदि हम पद्य में इस शब्द के प्रयोग से बचें और उसके स्थान पर *विशाल जीव*  शब्द का प्रयोग करें तो???

आ. Jagat Naresh जी : ये भी तो अस्पष्ट होगा... विशाल जीव 

आ. Anupama Agrawal जी : लेकिन सर गद्य में लिखा गया है *बड़ा सा जानवर*

आ. Anant Purohit जी : अज्ञात जीव
ऐसा करें तो आदरणीय और अज्ञात जीव को महिषासुर कहते हैं क्षेत्रीय लोग यह गद्य में स्पष्ट है

आ. Anupama Agrawal जी : ये भी किया जा सकता है या फिर
 *पशु आकृति*??

आ. Jagat Naresh जी : जी ये गद्य में है और अनुमानित है

आ. Anupama Agrawal जी : सर! मेरे विचार से एक विशालकाय आकृति वहाँ थी ये तो सत्य है ये तो अनुमानित नहीं है।और जीव शब्द का प्रयोग किसी के लिये भी हो सकता है तो संभवतः गलत तो नहीं होना चाहिये।शेष जैसा आप सबको उचित लगे

आ. Kumkum Purohit जी : जी वैसे तो महिषासुर काल्पनिक पात्र ही माना जाएगा पंरतु उस स्थान मै (कनकेवा) जंहा यह घटना घटित हुई है इसे महिषासुर नाम से ही जाना जाता है।इस प्रकार का जीव हमारे आदरणीय पुरोहित जी ने कभी देखा नही था, तो हम भी यही मानना पड़ा कि हो न हो वो वही महिषासुर ही होगा ।अन्य किसी विशाल जीव का नामकरण इस कृति में  सही नही लगता।

आ. Jagat Naresh जी : *बड़ा जानवर* और *बड़ा सा जानवर* के बीच यही तो एक फर्क है। एक स्पष्ट है और दूसरा अनुमान

आ. Kumkum Purohit जी : एक सुझाव है ,यदि ब्रह्म राक्षस किया जाए तो, क्योंकि उस स्थान में  कुछ  लोगों ने उस जीव को ब्रह्म राक्षस के नाम से भी पहचाना 

आ. Anant Purohit जी : बहुत विशालकाय थी या नहीं भैया ही बताएँगे, वही भुक्तभोगी हैं इस घटना के

परंतु विचित्र जरूर था वह जीव

आ. Jagat Naresh जी : जी विचित्र तो जरुर रहा होगा और अस्पष्ट भी।

आ. Khirod Purohit जी : हा रहस्यमयी घटना थीं। विशालकाय जीव जैसा था कुछ। उस दिन जितना नहीं डरा था  अब उसकी समीक्षा से ज्यादा डर लग रहा है ।
आ. Jagat Naresh जी : ये प्रत्यक्ष देखा गया दृश्य है तो विचारणीय है कि देवी-देवता कोई काल्पनिक नहीं हैं। है तो सत्य पर उसकी व्याख्यान में वास्तविकता का प्रमाण कैसे दे सकते हैं।
         अर्थात् इस महिषासुर को कैसे स्पष्ट किया जा सकता है ?
एक सुझाव...

प्रदोष अंत --
तालाब में विशाल
अज्ञात जीव।

आ. Kumkum Purohit जी : 👌👌
आ. Abhilasha जी : 👌👌👌

आ. Jagat Naresh जी : आप सबके सुझाव अनुसार शायद ये ठीक बन गया है।

आ. Abhilasha जी : जी आदरणीय भाव गद्य के अनुकूल है।

आ. Jagat Naresh जी : तो अब आ. पंडा जी से निवेदन है कि उनके भाव अगर इस संशोधन में आ रहे हैं और सहमत हैं तो संशोधित कर पुनः प्रेषित करें।

आ. Jagat Naresh जी : आगे चर्चा आरंभ करते हैं...

उपरोक्त विषय में हमने वास्तविकता का दर्शन किया और मान्यतानुसार महिषासुर को आज भी आ. क्षीरोद्र के माध्यम से प्रत्यक्ष पाया। तो क्या अब यह काल्पनिक है।

मैं चाहुँगा कि प्रकृति के ऐसे सभी घटनाएँ जो वास्तव में हमारे बीच यदा कदा घटते रहते हैं उसे सामने लाकर प्रमाण प्रस्तुत किये जायें और यह कल्पना मात्र नहीं अपितु एक सच्चाई है। इसे देश दुनिया के सामने लाकर वास्तविकता से परिचित कराया जाए। ताकि प्रकृति के एक-एक अंग से कोई अनभिज्ञ न रहे।

आ. Kumkum Purohit जी : जी काल्पनिक तो नही कहा जा सकता  पंरतु हमने इसे नही देखा तो हम इसकी कल्पना ही कर सकते हैं ।परंतु कुछ तो वास्तविकता है जो मान्यता में प्रचलित है,इस घटना को  देखे तो हम वास्तविकता  को नकार  भी नही सकते।

आ. Jaishree Panda जी : अर्द्ध यामिनी~
सरोवर पे खड़ा
महिषासुर
ईस पर काफी चर्चा के बाद प्रभात जी की समीक्षा के पश्चात सुधारा गया

प्रदोष अंत~
सरोवर पे खड़ा
महिषासुर
किया गया।पर ये भी कुछ उचित नही लगा।

इसके पश्चात 7 अगस्त को फिर चर्चा हुई और ईसे सर्वसम्मति से फिर सुधारकर 
प्रदोष अंत~
तालाब में विशाल
अज्ञात जीव

किया गया।
ईसमें अभी भी प्रदोष काल खटक रहा है।
इसलिये आ.जगत सर क्या इसे ऐसा करें

विशालकाय
जीव तालाब मध्य~
ग्रीष्म की रात


करें क्या? 

रात करें तो सुर्यास्त से लेकर सुर्योदय का कोई भी समय हो सकता है।इससे भ्रम दूर हो जायेगा।व महिषासुर वाली समस्या भी नहीं रहेगी।

सादर।जिज्ञासा मात्र

आ. Jagat Naresh जी : ये भी उचित 👌👌

इसे...

तालाब मध्य
विशालकाय जीव

👆ऐसे करना चाहिए मेरे विचार से 

आ. Jaishree Panda जी : आज मैं आप लोगों को जो बताने  जा रही हूं वह सत्य  व आश्चर्यजनक घटना है, परन्तु आज के वैज्ञानिक युग में यह बात   विश्वास से परे है परन्तु सत्य है।‌‌।      
            आज से लगभग 8-10 साल पहले की बात है जब भैया महासमुंद जिले के सरायपाली ब्लॉक के एक छोटे से गांव "कनकेवा" में रहते थे। जेठ का महीना था।भयंकर गर्मी थी शाम को नहाए बिना रहा नहीं जा रहा था। एक दिन भैया किसी काम की वजह से शाम को तलाब नहाने नहीं जा सके और रात हो गई।करीब 9-9:30 बज गए। और गर्मी की वजह से बिना नहाए रहा भी नहीं जा रहा था इसलिए वे तलाब की ओर चल पड़े।तभी रास्ते में उन्हें एक-दो वयोवृद्ध जो बाहर बैठे थे उन्होंने मना किया कि इतनी रात को तलाब न जाएं। पर भैया को भूत-प्रेत पर विश्वास नहीं था इसलिए वे नहीं माने।जब वो तलाब पहुंचे तब वहां एक-दो लोग पहले से मौजूद थे।जो नहा चुके थे और वापस आ गए । फिर भैया तलाब में अकेले हो गए । फिर हुआ यूं कि उन्हें दूर तालाब के बीचों बीच एक बड़ा जानवर सा दिखाई दिया। वो फिर भी नहीं  डरे और नहाने काउपक्रम करने  लगे फिर क्या था बड़ा सा जानवर तुरंत उनके पास आकर खड़ा हो गया और अचानक ही उनके मुंह से एक डरावनी चीख निकल गई। और वो बिना नहाए ही वापस आ गए।दूसरे दिन जैसे ही यह बात गांव वालों को पता चली सबने कहा कि हम आपको इसलिए रात को जाने से मना कर रहे थे । तालाब में महिषासुर रहता है।  ‌‌

तालाब मध्य
विशालकाय जीव~
ग्रीष्म की रात

जयश्री पंडा

       उपरोक्त चर्चाओं से हमें पता चलता है कि जब कोई आपबीती प्रत्यक्ष हो तो उसे कभी हम नकार नहीं सकते। हाँ जिसके साथ ऐसी घटना न घट जाए तब तक उसके लिए केवल काल्पनिक है। ऐसे में हम किसी के साथ घटी घटना को लेकर कोई सृजन करें तो क्या वह काल्पनिक होगा या फिर यथार्थ ? 
      यह अब तक अनसुलझा है, इस तारतम्य आपके विचार आमंत्रित हैं। कृपया उचित मार्गदर्शन करें...

प्रमुख संचालक
हाइकु विश्वविद्यालय

Friday, 24 July 2020

चर्चा सार में...

कोरोना काल--
कंटेन्मेंट जोन में 
घुसा विक्षिप्त

सुकमोती चौहान

आ. सौरभ प्रभात जी: कंटेन्मेंट जोन के लिये नियंत्रण क्षेत्र का प्रयोग किया जा सकता है शायद 

आ. निधि जी: मुझे कोरोना काल सही बिंब नही लगा कभी भी ..कोरोना महामारी है रोग है कोई काल नही है..
पहले भी बहुत सी महामारियां और भीषण दुर्घटनाएं हो चुकी ..लेकिन उनको काल नही लिखा गया..
जैसे ..
हैजा काल
भोपाल गैस कांड काल
उपहार सिनेमाहाल अग्निकांड काल 
विश्व युद्ध काल 
आदि
लेकिन बहुत सारी रचनाएं लिखी जा चुकी हैं कोरोना काल को बिंब बना कर
किन्तु मेरी मंदमतिनुसार ये बिंब गलत है 
सादर क्षमाप्रार्थी

आ. सुकमोती जी: जी दीदी आपका कहना सही है किन्तु *कोरोना काल*  महामारी के लम्बी समयावधि को दर्शाने के प्रयोग किया है 

आ. निधि जी: विश्व युद्ध तो कई वर्षों चला
हैजा महामारी भी बहुत समय तक फैली

आदरणीय सर के विश्लेषण की प्रतीक्षा है

आदरणीय जगत नरेश जी: आपके सटिक विचार और चोखी नजर को सादर नमन् आ. निधि जी

कृपया इस विषय सुझाव रखें कि इस काल को और किस तरह रखें कि वह एक पूर्ण बिम्ब हो, सादर निवेदन

आ. निधि जी: हार्दिक आभार आदरणीय सर ...मेरी कोई विशिष्टता नहीं है इसमें...आप सब के मार्गदर्शन और समीक्षा से ही सीख रहे हैं हम सब ...कोरोना काल वाली रचनाएं पढ़ी तो जो विचार आया वही साझा किया था

आ.जगत नरेश जी: मेरा मानना है कि हम जिसे दिखाने में सक्षम नहीं हो पाते या यूँ कहें कि जिसका दृश्य नहीं बन पाता तो उसके चरम शब्दों से कथ्य के माध्यम से उस बिम्ब को पाठक तक पहुँचा सकते हैं। पर जिसका दृश्य बनता हो उसका कथ्य बिम्ब शून्य मान्य न दें तो बेहतर।
     शेष आप सभी इस विषय में विचार के पश्चात् निश्चित करेंगे। आप सबके विचार सादर आमंत्रित हैं।

आ. सौरभ प्रभात जी: *कोरोना काल का बिंब रूप में निरूपण कितना सार्थक*


कई दिनों से पटल पर कोरोना काल को लेकर असमंजस की स्थिति उत्पन्न है, कि इसे बिंब के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है अथवा नहीं। इस परिचर्चा में मेरी समझ से एक छोटा सा विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा हूँ।

*काल* शब्द स्वयं में काफी विस्तृत है। इसके उच्चारण मात्र से पाठक अथवा श्रोता को किसी खास समय का उसकी विशेषताओं के साथ भान हो जाता है। जैसे रामायण काल कहते ही मानस पटल पर राम, रावण, हनुमान, लंका, अयोध्या, इत्यादि के दृश्य चलायमान हो जाते हैं, ऐसा ही महाभारत काल की भी स्थिति है। मुगल काल हो या अंग्रेजी शासन काल, इन सब की कुछ खास ऐसी विशेषतायें है, जिसने एक बहुत बड़े भूखंड पर समान आचार, विचार व व्यवहार को प्रतिस्थापित किया।

 बाढ़ की आपदा, अकाल, हैजा महामारी, भोपाल गैस त्रासदी, या कोई अन्य प्राकृतिक जन्य आपदायें.... ये सभी भी अपने आप में महत्वपूर्ण हैं, परंतु इनका दायरा निश्चित होता है, या तो इनका फैलाव क्षेत्रीय स्तर पर हुआ या होता है अथवा इनकी पुनरावृति होती रहती है। पूरा विश्व कभी एक बार में ही इनकी चपेट में आया हो, ऐसा ज्ञान नहीं है मुझे। जहाँ तक बात है विश्वयुद्ध की, तो इससे पूरा विश्व प्रभावित तो हुआ परंतु अप्रत्यक्ष रूप से। प्रत्यक्ष रूप में इसका असर भी सीमावर्ती क्षेत्रों अथवा सेनाकर्मियों एवं शासनतंत्र तक सीमित रहा। इस अवधि में कोई ऐसा विशेष आचरण व्यवस्था भी रही हो, इसमें भी संदेह है। अतएव इन्हें काल की संज्ञा देना वैसे भी उचित प्रतीत नहीं होता।

अब बात करते हैं कोरोना की, एक दुःसाध्य रोग, जिसने एक छोटे से कस्बे से अपना स्वरूप पाया और देखते ही देखते वैश्विक रूप इख्तियार कर लिया। वैश्विक स्तर पर करोड़ों जनता को प्रभावित करता यह रोग अपने साथ कुछ खास आचार, नियम, व्यवहार लेकर आया, जो पूरी दुनिया में मान्य किये गये, जिसके कुछ उदाहरण हैं - मास्क, सैनेटाइजर, लॉकडाउन, सामाजिक दूरी इत्यादि। अभी तक के कालखंड में किसी भी बीमारी ने पूरे विश्व को एक ही तरह के नियम व्यवहार के दायरे में नहीं बाँधा था, (और ईश्वर से कामना है कि भविष्य में भी ऐसा न हो).... यदि फिर कभी ऐसा होता भी है, तो भी सर्वप्रथम तो सदा ही याद रखा जाता है। इसप्रकार यदि हम देखें तो पायेंगें कि कोरोना संक्रमण का ये दौर मानव जीवन की एक अमिट याद बनकर सदा ही रहने वाला है, जिसके नाम से ही बहुत से दृश्य यथा- मुख पर मास्क लगाये लोग, सैनेटाइजर का प्रयोग एवं गंध, पीपीई सूट, लॉकडाउन और उससे जुड़ी अनेकानेक परेशानियाँ इत्यादि मानसपटल पर स्वतः ही उभर आयेंगें। ऐसे में कोरोना संक्रमण का इस दौर को *कोरोना काल* की संज्ञा देना अतिशयोक्ति नहीं होगी और बिंब के रूप में इसका निरूपण भी मेरी समझ से सर्वोचित है।

आ.अनुपमा अग्रवाल जी: सहमत हूँ मैं भी आपके विचार से

आ. अभिलाषा जी: सहमत हूं भाई,कोरोना काल बिंब सशक्त है। इस काल में जो भी घटित हो रहा है,उसे जब हम दूसरे बिंब के रुप में लेते हैं तो वह दृश्य रूप में आह-वाह के पल निर्मित करता है,ऐसा कब हुआ इससे पहले की रुग्ण वाहिनी आई
और उसके बाद पूरे क्षेत्र को कन्टेंट मेंट क्षेत्र घोषित करके सेनेटाइज किया गया हो या किसी को अपने प्रिय का शव छूने न दिया गया हो या अतिथि के आने-जाने पर प्रतिबंध हो।मेरे ख्याल से इस बिंब से संबंधित हाइकु इस समय की घटना या दृश्य को मार्मिकता से चित्रित करते हैं।
काल कहने से लंबी समयावधि का बोध होता है पर उस काल में घटित घटना एक पल की अनुकृति होती है।जो उस कालखंड को सीमित कर देती है।मेरी मति के अनुसार।बाकी विद्वजन जैसा सोचे।

आ. अनुपमा अग्रवाल जी: बिलकुल सही कहा आपने दी👍👍

मेरा भी यही मानना है।आज तक ऐसा कुछ भी इससे पूर्व सुनने में नहीं आया  कि पूरे विश्व में लाॅकडाउन हुआ हो।क्या आज तक इतिहास में कभी मंदिर मस्जिद बंद हुए हैं?? और आज तक का इतिहास यदि उठाकर देखा जाये तो हवाई यात्रा, रेल यात्रा, बस कभी भी इस तरह से इतने दिनों के लिए बंद  नहीं हुए।मुंबई के लिये ये प्रसिद्ध है कि मुंबई कभी रुकती नहीं और यहाँ की लोकल रेल सेवा यहाँ की जीवन संचायिनी मानी जाती है जो हर वक्त दौड़ती ही रहती है।अबकी बार पहली बार इतने दिनों के लंबे समय के लिए बंद हुई है।न ही इससे पूर्व कभी इतनी बड़ी मात्रा में सैनेटाइज़र और मास्क का उपयोग वैश्विक स्तर पर देखने में आया।अतः मेरे विचार से भी ये एक सशक्त बिंब है जिसे पढ़ते ही आँखों के समक्ष इस पीड़ा से गुजर रही त्रासदी की याद ताज़ा हो जायेगी।

हाइकु विश्वविद्यालय

हाइबन लेखन की सरल विधि चर्चा से सीखें...

आदरणीय सौरभ प्रभात जी के शब्दों से शुरुआत:
*हाइबन लेखन कैसे करें?

मेें पढ़ें...

हाइकु लिखना सीख चुके साहित्यसेवियों के लिये हाइबन लेखन बहुत ही आसान विधा है। हाइकु और हाइबन में एक सूक्ष्म सा अंतर है और वही अंतर हाइबन को सरल भी बना देता है। हम जब हाइकु लिखते हैं, तो कई बार पाठक हमारे किसी बिंब को समझ नहीं पाता अथवा दोनों बिंबों के मध्य संबंध स्थापित नहीं कर पाता, परंतु हाइबन में हम अपने हाइकु का विश्लेषण पहले ही प्रस्तुत कर देते हैं, और इसके कारण पाठक को नीचे लिखे हाइकु को समझने में बहुत ही आसानी हो जाती है। विधान और नियम हाइकु की तरह ही हैं।

अब बात करते हैं कि इसे लिखें कैसे? तो जैसा कि हम जानते हैं कि हाइकु की तरह ही हाइबन भी प्रकृति मूलक विधा है, अतः हम जो भी लिखेंगें, कोशिश यही होनी चाहिये कि वो किसी प्राकृतिक दृश्य से प्रेरित हो, जिसे देख/पढ़ पाठक के मुख से स्वतः ही आह या वाह निकल जाये। परंतु चूँकि यहाँ 5-7-5 के क्रम में सजी कृति के साथ एक लेख/डायरी का अंश/संस्मरण भी प्रस्तुत करना होता है, अतः कोई ऐसा दृश्य चुनें जो सामान्यतः लोगों के आकर्षण का केन्द्र बिंदु हो। सबसे महत्वपूर्ण यही है कि आप ऐसे दृश्य का चुनाव करें जो सामान्य रूप से न देखे जा सकें, अपितु किसी खास स्थान अथवा खास परिस्तिथि/काल में ही दृष्टिगोचर हों। अब उस दृश्य के विषय का विश्लेषण करती यथार्थपरक पंक्तियों को एक छोटे लेख/संस्मरण का रूप देकर लिख लें। यहाँ एक अच्छी बात ये भी है कि इस लेख/संस्मरण को आकर्षक बनाने के लिये हमें यहाँ सभी प्रकार की उपमाओं और अलंकारों के प्रयोग की स्वतंत्रता है। अब अपने लेख/संस्मरण के आधार पर हमें एक हाइकु का सृजन करना है, जिसमें इसका सारतत्व समाहित हो (हाइकु लेखन के नियमों को ध्यान में रखते हुये) और बस तैयार हो गया आपका हाइबन।

इसका एक उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ, जिससे आपको समझने में सहूलियत हो -

*हाइबन*

        उत्तराखंड के चमोली जिले में 16,500 फीट की ऊँचाई पर स्थित, रूपकुंड झील सचमुच सुंदर हिमालय के बीच स्थित एक आकर्षक झील है। इसे अक्सर मिस्ट्री लेक यानि रहस्यमयी झील कहा जाता है जिसका कारण है कि यहाँ पानी से ज्यादा मानव कंकाल मिलते हैं। यहाँ 600 से अधिक मानव कंकाल खोजे गये हैं। रुपकुंड झील हिमालय के ग्लेशियरों के गर्मियों में पिघलने से उत्तराखंड के पहाड़ों में बनने वाली छोटी सी झील है। जिसके चारों ओर ऊँचे-ऊँचे बर्फ के ग्लेशियर हैं। यहाँ तक पहुँचने का रास्ता बेहद दुर्गम है, इसलिए यह जगह एडवेंचर ट्रैकिंग करने वालों की पसंदीदा जगह है। यहाँ पर गर्मियों में बर्फ पिघलने के साथ ही कहीं पर भी नरकंकाल दिखाई देना आम बात है। यहाँ तक कि झील के अंदर देखने पर भी तलहटी में भी नरकंकाल पड़े दिखाई दे जाते हैं। यह दृश्य अच्छे अच्छों को दाँतों तले अंगुली दबाने पर मजबूर कर देता है। हाइबन के रूप में इसे ऐसे देख सकते हैं -

*ग्रीष्म मध्याह्न*~
*रुपकुंड तल में*
*नर कंकाल*

*-सौरभ प्रभात*
मुजफ्फरपुर, बिहार

आदरणीया अनुपमा अग्रवाल जी के शब्दों से: 'हाइबन'- ये नाम सुनते ही एक प्रश्न मन में कौंधता है सबसे पहले ," ये क्या है?"
तो सबसे पहले यदि हम इसके शाब्दिक स्वरूप की चर्चा करें तो ये एक जापानी भाषा का शब्द है, जो दो शब्दों को जोड़ कर बना है 'हाइ' और 'बन'- 'हाइ' का अर्थ होता है 'काव्य' और 'बन' का अर्थ होता है 'गद्य',अर्थात् हाइबन गद्य एवं काव्य के मिश्रण को कहते हैं।
हाइबन लेखन का आरंभ भी कवि बाशो ने 1690 में एक यात्रा संस्मरण के रूप में किया था,जब उन्होंने अपनी एक यात्रा के अनुभव को अपने एक शिष्य के साथ साझा किया और उसके अंत में एक हाइकु लिख दिया,और इस तरह से इस विधा का जन्म हुआ।
हाइकु जहाँ पाठक को कल्पना की उड़ान भरने की स्वतंत्रता प्रदान करता है, वहीं हाइबन लेखक को।
हाइबन लेखन में रचनाकार अपनी कल्पना की उड़ान स्वप्न लोक तक भर सकता है,अर्थात् अपने स्वप्न को भी साकार रूप प्रदान कर सकता है। हाइबन में लेखक को अलंकारों के प्रयोग की भी छूट है।हाइबन में एक एक शब्द का प्रयोग बहुत सोचकर किया जाना चाहिये और अंतl में लिखा जाने वाला हाइकु आपके गद्यांश को पूर्णता प्रदान करता उसका ही विस्तार हो,इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है।
हाइबन का गद्यांश बहुत अधिक छोटा या बहुत अधिक बड़ा नहीं होना चाहिये। लगभग 100 से 200/250 शब्दों तक की ही शब्द सीमा होनी चाहिये।
हाइबन भी एक प्रकृतिमूलक विधा है,अतः इसमें हमें प्रकृति के ऐसे अनसुलझे गूढ़ रहस्यों के विषय में जानने को मिलता है जिनसे हम अभी तक अनभिज्ञ थे।
यदि संक्षेप में कहूँ तो हाइबन एक तरह से हाइकु की विवेचना  है।
आइये, इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं----

नॉर्वे के उत्तरी इलाके में सूर्यास्त के समय कुछ ऐसा नज़ारा देखने को मिलता है कि देखने वाला दाँतों तले उंगली दबा ले। प्रकाश की  मानो आँखमिचौली सी चलती है यहाँ। ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई चित्रकार अपनी कूंचियों से रंग बिखेर रहा हो. दरअसल ये एक ऐसी प्राकृतिक  प्रक्रिया है जिसमें लाल,पीले, नीले,नारंगी, हरे और बैंगनी रंगों का अद्भुत समागम चारों ओर देखने को मिलता है. जब लाल, पीले रंगों के बीच जल में नीले पर्वत का बिंब दिखाई देता है तो अचरज से आँखें फटी की फटी रह जाती हैं, प्रकृति की इस छटा को देखकर।प्रकृति का यह अद्भुत दृश्य अधिकांशतः सर्दियों की शाम में देखने को मिलता है जब चुंबकीय गोले के ऊर्जा कण पृथ्वी के वातावरण से टकराते हैं।इसे हाइबन में यूँ देख सकते हैं--

शिशिर सांझ~
लाल पीले जल में
नीला पर्वत

हाइबनकारा-
अनुपमा अग्रवाल

आदरणीया दीपिका पाण्डेय जी कहती हैं:
*|| हाइबन पद्धति ||*

     हाइबन,बहुत ही रोचक व ज्ञानवर्धक विधा है।यह एक ऐसा लेख है जिसमें आप प्रकृति में घटित किसी अविस्मरणीय घटना,विचारों एवम् अपने अनुभव को डेली डायरी,संस्मरण या लघुकथा का स्वरूप देते हैं।लेख को हमें सभी अलंकारो और बिंबों से सुसज्जित करने की छूट प्रदान होती है ताकि यह लेख और भी आकर्षक लगे।फिर संपूर्ण लेख के सार तत्व को हाइकु में पिरोया जाता है । हाइकु के नियम इस प्रकार है.....

1. दो वाक्य, दो स्पष्ट बिम्ब हो।
2. किसी एक बिम्ब में प्राकृतिक का होना अनिवार्य है।
3. दो वाक्य, 5 में विषय और 12 में बिम्ब वर्णन हो सकता है।
4. दो वाक्य, विरोधाभास भी हो सकते हैं।
5. स्पष्ट तुलनात्मक न हो।
6. कल्पना व मानवीयकरण न हो ।
7. वर्तमान काल पर हो।
8. एक पल की अनुकृति, फोटोक्लिक हो।
9. कटमार्क (दो वाक्यों का विभाजन) चिन्ह हो।
10. दो वाक्य ऐसे रचे जाएँ जो एक दूसरे के पूरक न होकर कारण और फल न बने।
11. रचना में बिम्ब या शब्दों का दोहराव न हो।
12. तुकबंदी से बचें।
13. 5 वाले हिस्से में क्रिया/क्रियापद और विशेषण न हो।
14. 12 वाले हिस्से में एक वाक्य हो।
15. बिना बिम्ब के केवल वर्तनी न हो।
16. पंक्तियाँ स्वतंत्र न हों।
17. विधा प्रकृति मूलक है, किसी धर्म या व्यक्ति विशेष न हो।
      ****************

      *निःसंदेह प्रकृति सौंदर्य तथा उसके विभिन्न स्वरूपों का हमारी प्रथाओं, मान्यताओं से अमिट संबंध है। जिसके रहस्यों को अपने हाइबन के माध्यम से उजागर करते हुए हम सभी समाज को एक नई सकारात्मक दिशा में ले जाते हैं।*
तो आइये एक उदाहरण के माध्यम से हम हाइबन समझने का प्रयास करते हैं।

उदाहरण...

1) *हाइबन*

          हरेला, पहाड़नों का एक जाना माना प्रकृतिक पर्व है।जिसे हार्दिक उल्लासपूर्वक मनाया जाता है।हरेला को श्रावण के दस पंद्रह दिन पहले अर्थात आषाढ़ में बोया जाता है।इसे बाँस की टोकरी इत्यादि पात्र में अंदर से लीप कर उसमें गेहूँ,जौ,धान,उड़द इत्यादि सात प्रकार के बीजों को बोया जाता है और इसे पवित्र व साफ जगह की दृष्टि को ध्यान में रखकर मंदिर में भी रखा जाता है और पवित्रता को ध्यान में रख कर ही हरेला लकड़़ी से ही गोड़ा जाता है। इन बीजों को उगाने के लिए नियमित पानी दिया जाता है। इसका ऐसा करने का वैज्ञानिक कारण यह भी है कि हमारे पूर्वज जिन्हें बखूबी खेतीबाड़ी का ज्ञान था वे यह पता लगाने का प्रयास करते थे कि जो तात्कालिक ऋतु है क्या वह फसल उगाने के लिये उपयोगी है या नहीं? एक तरह से हम कह सकते हैं कि यह एक विशेष प्रकार का प्रयोग था जिसे आज भी हमारे देश भारत के पहाड़ी इलाकों में देखा जा सकता है और तब से ही यह परंपरा चली आ रही है। श्रावण के आते आते जब ये हरेला बढ़ जाते हैं तो उन्हें काट लिया जाता है और चहुँओर खुशी की लहर दौड़ पड़ती है सभी आश्वस्त हो जाते हैं कि अब फसलें उगाई जा सकती है।इसी खुशी में घर के बड़े,कृषक आदि प्रकृति की पूजा करते हैं, उसे धन्यवाद देते हुए अपने कान पर हरेला लगाते हैं और फिर बुआई का कार्य आरंभ कर देते हैं।सभी लोग हरेली गीत गाते हैं। गीतों के माध्यम से धान के महत्व का बखान करते हुए प्रकृति से आह्वान करतें हैं कि इस वर्ष इतना धान हो जाए कि जिसे सिलबट्टे तक में पीसना पड़े(एक व्यंग्य)। घर में तरह तरह के पकवान बनाते हैं।हरेला का यह पर्व १५-१६ जुलाई को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।इस पर्व में सार्वजनिक रूप से छुट्टी की भी घोषणा की जाती है।निःसंदेह उत्तराखंड की यह संस्कृति पर्यावरण संरक्षण का एक मूल हिस्सा है इसलिए ही यह अवकाश दिया जाता है ताकि अधिक से अधिक लोग पौधरोपण कर सके।प्रकृति प्रेम को सही मायने में उजागर कर सकें।हरेला पर्व वर्षा ऋतु और श्रावण की शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है और इस प्रकृति परंपरा को अक्षुण्य बनाए रखने के लिये ही बेटियों को ससुराल से मायके(मैत गृह) बुलाया जाता है ताकि यह परंपरा आगे भी बढ़ती रहे और लोग हमारे पूर्वजों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रकृति के महत्व को समझ सके।इसे हम इस प्रकार भी कह सकते हैं..

*आषाढ़ दिवा~*
*हरेला की गुड़ाई*
*मैतगृह में।*

    तो आइए एक अन्य हाइबन भी देखते हैं...

2) *हाइबन*

        कैलिफोर्निया स्थित एक योज़माइट नामक जलप्रपात है जिसे होर्सटेल के नाम से भी जाना जाता है और यही जलप्रपात फरवरी माह के सप्ताहांत तक आते आते नारंगी रूप में बदल जाता है।इसका मुख्य कारण फरवरी माह के अंत तक जब सूरज की किरणें सही कोण बनाते हुए झरने पर पड़ती है तो झरना नारंगी रंग में बदल जाता है।पर्यटक यह दृश्य देख आचंभित रह जाते हैं कि पानी के साथ साथ आग भी निकल रही है।इस कारण इसे आग का झरना भी कहा जाता है।तो इसे हम इस प्रकार से भी कह सकते हैं--

*अंतिम माघ*~
*जलप्रपात संग*
*नारंगी आभा।*

---दीपिका पाण्डेय

आदरणीया कुमकुम पुरोहित जी बताती हैं: *हाइबन लेखन की विधि*

हाइकु की व्याख्या को हम हाइबन का नाम  दे सकते है। अंतर बस इतना है कि हाईकु रचना को पढ़ने के बाद  पाठक स्वतंत्र होता है कि वह उस रचना  से क्या भाव  ग्रहण करता है ,पंरतु हाइबन रचना में  पाठक को भाव  ढूँढने की आवश्यकता ही नही पड़ती रचनाकार स्वयं ही प्रारंभ से अपनी रचना का विशलेषण करता चला जाता है,उसके मूल से लेकर अंत तक के सभी तथ्यों और रहस्यों का उजागर करते हुए उस रचना को इतना अधिक  परिष्कृत कर देता है कि पाठक के मन में  सहज ही एक उत्सुकता सी बनने लगती है कि वाह यह तो बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक रहस्य है।इस प्रकार से अंत में रचनाकार अपने विषय को पूर्ण  करता हुआ उसका सारतत्व  निचोड़कर 5 ,7,5 के क्रम में  संस्मरण, डायरी  या लघुकथा  में उसे हाइबन का रूप  देकर परोस देता है।जिसे पढ़कर न केवल उस विषय का ज्ञान, अपितु रोमांच की लहर सी अभिभूत होती चली जाती है।
   हाइबन विधा  की सबसे बड़ी  विशेषता ही यही है कि - हम पहले किसी भी रचना को पढ़कर उसकी व्याख्या या भाव को उजागर करते है पंरतु हाइबन विधा में  हम व्याख्या  को पढ़ने  के पश्चात अंत  मे उसके सारतत्व के रूप में उस रचना का   फोटोक्लिक हमारे  आखों के सामने दिखने लगता है।  इस प्रकार से रचनाकार न केवल अपनी रचना ही बल्कि अपने  अनुभव  प्रकृति के रहस्यों, तथ्यों ,किसी विशेष स्थान, रीति रिवाज आदि को अपने शब्दों में  पिरोकर उपमा और अलंकार  से सुसज्जित करके पाठक को परोसता है
इसको उदाहरण के रूप में  इस प्रकार भी समझा  जा सकता है-

हाइबन---
*हारिल या हरियाल पक्षी** जिसे yellow footed green pigeon भी कहते हैं । हरियाल पक्षी महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी है।यह ट्रेरन फाॅनीकाॅप्टेरा(Treron phoenicoptera)  की प्रजाति का है।यह पहली बार भारतीय उपमहाद्वीप में देखने को मिला था।हारिल पक्षी श्रीलंका, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल में भी पाया जाता है।हारिल पक्षी को पीपल और बरगद के फल बहुत प्रिय है,अतः यह इन्ही वृक्षों पर रहते है।हारिल एक  शाकाहारी और सामाजिक पक्षी है यह झुण्ड में  ही पाया जाता है। हारिल के विषय में मान्यता है कि यह पक्षी जमीन पर नही बैठता।अपनी प्यास बुझाने के लिए भी जमीन पर नही उतरता,फलों और पत्तों पे पड़े  ओस की बूंदों से अपनी प्यास बुझा लेता है।और यदि जमीन पर उतरता भी है तो अपने पंजों पर लकड़ी का टुकड़ा या तिनके को पकड़े हुए रहता है।इसी विशेषता के कारण हारिल  पक्षी का वर्णन धार्मिक और साहित्यक रचनाओं में  मिलता है जिसका उदाहरण महाकवि सूरदास ने अपने *सूरसागर* के पांचवे खण्ड में  इस प्रकार दिया है।
" *हमारे हरि हारिल की *लकरी।"*
अर्थात गोपियां श्री कृष्ण के प्रति अपनी अनन्य भक्ति को प्रकट करती हुई  कहती है कि जिस तरह से हारिल पक्षी एक लकड़ी का टुकड़ा हमेशा पकड़े रहता है और उसे विश्वास होता है कि वह लकड़ी का टुकड़ा उसे जमीन पर गिरने नही देगा ठीक उसी प्रकार श्री  कृष्ण भी हमारे  लिए  वही लकड़ी का टुकड़ा है जो हमें  कभी गिरने नही देंगे निराश नही करेगें ।
हाइबन में इसे हम इस प्रकार कह सकते हैं-

*पीपल शाख~*
*हारिल चोंच पर*
*ओस की बूँद*

कुमकुम पुरोहित

आदरणीया गीतांजलि जी के अनुसार: *हाइबन लेखन की विधि*

वैसे तो हाइकु अपने आप में एक अनोखी विधा है जो मात्र १७ अक्षरों में एक चित्र अंकित कर जाती है मानस के पटल पर, किन्तु कई बार इन सीमित शब्दों में चित्रित दृश्य ऐसे होते हैं जो साधारण से हट कर होते हैं, और बिना सन्दर्भ के उन्हें समझ पाना पाठक के लिए सम्भव नहीं। ऐसे में कवि अपने शब्दों के माध्यम से उस संदर्भ से परिचित करवा दे तो ही बात बनती है। इस प्रकार की परिचय युक्त हाइकु को हाइबन कहा गया है।

#गीतांजलि

आदरणीया रुनू बरुवा जी के विचार:
आपकी बात से मैं सहमत हूँ। हाइबन कुछ ऐसा प्रतीत होता है जैसे आप चंद शब्दों में किसी घटना, इतिहास के पल अथवा दृश्य को लिख रहे है । गद्यांश में हाइबन के हाइकु का संक्षिप्त व्याख्या होता है जो पूर्ण होकर हाइबन बन जाता है ।


आदरणीय अनंत पुरोहित जी का: 

*एक विचार*

हाइबन और हाइकु दोनों में संरचनात्मक भेद कुछ भी नहीं है। ऐसे में क्या सभी हाइकु के साथ गद्यात्मक आलेख जोड़ देने से वह हाइबन बन जाएगी?

इस संदर्भ में विचार करने पर मेरा मत इस प्रकार है कि वह घटनाएँ या दृश्य जो सामान्य नहीं हैं; जो असाधारण प्रतीत होती हैं, असंभव प्रतीत होती हैं किंतु यथार्थ हैं उन्हें ही हाइबन में सम्मिलित करना चाहिए। अर्थात जब हम गद्यात्मक अंश को हटा दें तो वह एक स्वतंत्र हाइकु के रूप में नियमानुसार होने पर भी अविश्वसनीय लगे। चूँकि हाइकु में अविश्वसनीय घटनाओं की मान्यता नहीं है तब वह हाइकु नहीं रह जाएगा। गद्य के बिना उसका मूल्य न रह जाए।

तभी उस हाइबन के गद्य का महत्व बचेगा जो कि उस अविश्वसनीय घटना की पुष्टि करेगा कि यह अविश्वसनीय घटना है जरूर किंतु यह घटित हो चुकी है।

आदरणीय सौरभ प्रभात जी: आपके संदर्भ से शत प्रतिशत सहमत हूँ आदरणीय।

यदि बिना गद्य के ही कृति को समझा जा सके तो फिर हाइबन की आवश्यकता ही क्या है? सामान्य दृश्याें को संजोने के लिये हाइकु नामक विधा पहले से ही मौजूद है। नई विधा का सृजन तभी रोचक है सकता है, जब उसमें स्वयं की कोई खास विशेषता समाहित हो।

निश्चित तौर पर हाइबन सृजन की उत्पत्ति का मूल कारण ही ऐसे बिंबों का निरुपण है, जिसे बिना गद्य भाग के अविश्वसनीय तथा अकल्पनीय माना जाए।

आदरणीया संगीता गोविल जी के प्रश्न: दृश्य की उत्पत्ति कैसे हो? इस तरह के दृश्य तो कम ही मिलेंगे ।

आदरणीय सौरभ प्रभात जी: यह संसार तो ऐसे आश्चर्यजनक दृश्याें से भरा पड़ा है आ०, बस पैनी नजरों से ढूँढ़ने की जरूरत है।

 हर पल हर क्षण इस संसार में ऐसे दृश्य उत्पन्न होते ही रहते हैं, जो सामान्य से पृथक मानव को अचंभित कर जाते हैं। ज्ञान चक्षु को खुला रखें और बिंब स्वयं ही उपस्थित हो जायेंगें।

आ.अनुपमा अग्रवाल जी के मतः जी बिलकुल सहमत हूँ आपकी बात से।यदि हर हाइकु को हाइबन ही बनाना है तो दो अलग विधाओं के अस्तित्व का औचित्य ही क्या बनता है।

आदरणीया पाखी जी: नमस्कार सर, आपका आशय यह है कि अद्भुत ,अकल्पनीय घटनाक्रम को गद्य में ढाला जाए?

हाइकु और हाइबन का मूल अंतर शायद यही है कि एक कल्पना को अस्वीकार करता है और दूसरा कल्पना को स्वीकार !

आ. गीतांजलि जी: पूर्णतया सहमत 👍🏼

 मुझे हाइबन विधा बहुत अच्छी लगी, मानो हाइकु में प्राण फूंक दिये हों।

आदरणीय अनंत पुरोहित जी का कथन: नहीं कल्पना नहीं, अजीबोगरीब घटनाएँ संसार में होते रहती हैं जो सत्य हैं कल्पना नहीं परंतु यदा कदा होती हैं, एकबारगी विश्वास नहीं होता कि ऐसा भी हो सकता है

आदरणीया पूजा जी: एक से बढकर एक शानदार उदाहरण सार्गर्भित आकर्षक व्याख्या सहित ।आप सभी को बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ।

आदरणीया जयश्री पंडा जी: मैं अनंत की बातों से बिल्कुल सहमत हूंँ कि हाईबन एक ऐसी घटना से संबंध रखता है जो बिल्कुल सत्य हो परंतु सुनने में अविश्वसनीय लगता हो।

आदरणीया अनुराधा चौहान जी: जी मैं भी उनकी बात से सहमत हूँ

आदरणीया दीपिका पाण्डेय जी अनुसार:  मैं सहमत हूँ आदरणीय आपकी बातों से।

आ० मेरे विचार से हाइकु या हाइबन कोई भी कल्पना को स्वीकार नहीं करता है।हाँ,वो बात अलग है कि हम हाइबन में अपनी बातों को अलंकारों,बिंबो आदि से अलंकृत करके अपनी बातों को रुचिकर ढंग से पाठक के समक्ष प्रेषित कर सकते हैं ताकि वह देखने में और भी रोचक प्रतीत हो।

आदरणीया डाँँ. रुनू बरुवा जी कहती हैं: हाइकु और हाइबन में संरचनात्मक भेद नहीं है फिर भी दोनों की प्रकृति में भेद है। जहां हाइकु दो बिंब पर आधारित होती है वहीं हाइबन में कुछ तत्व और जुड़ जाते है। आप जब भ्रमण पर निकलते है तो अद्भुत,  अविश्वसनीय और इतिहास से जुड़ी बहुत सारी बातों से रूबरू होते है । ऐसी  बातों को हाइकु के नियम अनुसार लिखना होता है परन्तु यहां जो लिखा जाते है उसे पूर्णता गद्यांश ही देता है । आश्चर्यजनक घटनाए घटती रहती है  अतः उन पर और प्रकृति के अनुत्तरित प्रश्न भरे स्थानों पर हाइबन लिखी जा सकती है क्योंकि गद्यांश इसे रोचक बना देते है और पाठक की उत्सुकता बनी रहती है । हाइकु में जैसे आप के मुँह से 'आह' और 'वाह' निकल जाती है वैसे ही हाइबन आप के मुँह से 'अद्भुत' और 'लाजवाब ' बुलवा देगा । यह मेरे विचार है।

--- डाॅ. रुनू बरुवा 'रागिनी'


हाइकु विश्वविद्यालय 

Tuesday, 19 May 2020

कुमकुम पुरोहित जी की समीक्षा कुछ हाइकु में...

लाॅकडाउन~
डाक्टर नर्स पर
पत्थर वार

 निधि सिंघल
 
आदरणीया निधि जी की यह हाइकु आह! के पल समेटे हुए वर्तमान परिपेक्ष्य को प्रदर्शित करने वाली बहुत ही मार्मिक कृति है।
  *लाकडाउन* यह प्रथम  बिंब  पूरी रचना  का सार है जिससे हम जान सकते  है  कि आज पूरा  विश्व *कोरोना* नामक महामारी से  गंभीर संकट से जूझ रहा है  और   लाकडाउन नामक अस्त्र ही हमारा सुरक्षा कवच साबित हो रहा है ।अन्य कोई उपाय जीवन रक्षा नही कर सकती ।

 डाक्टर नर्स पर
 पत्थर वार

दूसरा बिंबआह! के पल से भरपूर है ।जिसमें अपनी जान की परवाह न कर हमारी जान बचाने वाले देव तुल्य डाक्टर, नर्स ,पुलिस पर भी हिंसात्मक व्यवहार किया जा रहा है उन्हे नुकसान पहुंचा कर अमानवीय होने का परिचय कुछ बुद्धिहीन लोगों द्वारा दिया जा रहा है। इसे ही विनाश काले विपरीत बुद्धि  कहा जाता है। हमे इस विपदा की घड़ी मे तो ऐसे लोगों का सम्मान और उत्साह बढाकर नतमस्तक होना चाहिए जो दिन रात केवल  हमारी सुरक्षा और बचाव के लिए अपने जीवन और जीवन  से बढ़कर अपने परिवार से भी दूर हैं ।क्या इससे भी कोई  बड़ा काम और कुछ हो सकता है ।हम तो अपने  परिवार सहित लाकडाउन है पर  उनकी सुरक्षा कौन  करेगा जो इस विपदा में  हमारे जीवनदाता है ।

दूसरी समीक्षा...

मिट्टी का लोंधा --
तल की छबाई में
चूड़ी के फूल

 नरेश जगत

आदरणीय नरेश जगत जी की यह कृति ग्राम्य परिवेश को उकेरने वाली वाह! के पल से भरपूर  एक  उत्कृष्ट रचना है ।
 *माटी का लोंधा*
प्रथम बिंब से ही हमें गीला मिट्टी  का लोंधा दिखाई दे रहा है,जो कि गाँव में  घरों  को बनाने  का काम  आता  है।क्योंकि गाँव के घर मिट्टी से बने होते  हैं 

तल की छबाई में
चूड़ी के फूल

दूसरा बिंब वाह से भरपूर है  जो यह दिखा रहा है कि गाँव में  घरों को मिट्टी से छबाई करतें हैं ।मिट्टी को हाथों से चिकना करके  फिर अपने  घरों को चिकना और सुन्दर बनाया जाता  है।इतना सुन्दर कि जैसे  आजकल के मार्बल और टाइल्स भी फीके पड़ जाएं ।शायद ये मार्बल, टाइल्स भी गाँव के घरों की मिट्टी की चिकनाई देख कर ही किसी को सूझ गया हो।गाँव में घरों को मिट्टी से छबाई करने के बाद उसकी सुन्दरता को चार चाँद लगाने के लिए किनारों पर टूटी चूडियों  को फूलों की आकृति देकर और अधिक आकर्षक बनाया जाता है,मानो किसी बहुत ही बड़े कलाकार ने अपनी कलाकृति उकेरी हो।और प्रायः सभी अपने घरों को इसी तरह सजाती हैं ।जो कि बिना  लागत और बिना आडबंर के बहुत ही सुन्दर और सहज ढंग से की जाती  है। वास्तव में  गाँव का परिवेश बहुत ही सौम्य, सहज,सुन्दर, शांत  और आनंदपूर्ण होता है।

समीक्षक
कुमकुम पुरोहित

19/05/2020
हाइकु विश्वविद्यालय

Saturday, 25 April 2020

2020 में हाइकु विश्वविद्यालय से क्षीरोद्र कुमार पुरोहित जी का एक ऐतिहासिक हाइकु...

[25/04, 9:27 PM] 

प्रक्षालक बू ~
दो हजार बीस की
लग्न पत्रिका 

हाइकुकार - क्षीरोद्र कुमार पुरोहित


सकारात्मक चर्चा व संशोधन पश्चात आ. क्षीरोद्र पुरोहित जी की इस कृति पर भिन्न-भिन्न हाइकुकारों की प्रतिक्रियाएँ इस प्रकार हैं -


आदरणीया कुमकुम पुरोहित जी के शब्दों में -
वर्तमान परिपेक्ष्य को प्रदर्शित करने वाला यह अति उत्तम और मार्मिक हाईकु है। करोना नामक इस भयंकर रोग से आज हमारा पूरा विश्व संकट ग्रस्त है।प्रत्येक कार्य स्थगित करने का फरमान जारी कर दिया गया है। इसी प्रकार लोगों को प्रत्येक वस्तु धोने और सेनेटाइजर करने की बाध्यता है ताकि हम सुरक्षित रहें । लोगों के वैवाहिक कार्यक्रम भी स्थगित और  बंद ही हो गये हैं । अतः जो भी खरीदारी  पूर्व से कर लिए गए  थे उसे भी भय से सेनेटाइजर किया जा रहा है।यहां तक कि लग्न पत्रिका को भी।दो हजार बीस की यह भयानक त्रासदी कभी भी भुलाया नही जा सकेगा, जिसमें लोगों को लोगों से मिलना तक प्रतिबंधित हो गया ।यह हाईकु इसी मार्मिक चित्रण की झलक है।
समीक्षक-
कुमकुम पुरोहित

अपने विचार आ. दीपिका जी ने कुछ इस तरह व्यक्त किया है-
आदरणीय,मार्मिकता को समेटे यह हाइकु वर्तमान स्थिति पर कोरोना जैसी महामारी को इंगित कर रहा है।जहाँ एक ओर प्रक्षालक का उपयोग हो रहा है।वहीं दूसरी ओर अनेक 2020 की अनेक शादियाँ समय से पूर्व ही स्थगित हो गई है।जिनका इस समय हो पाना असंभव है।उन्हें इंतज़ार करना पड़ेगा।यह दुखद स्थिति है।
समीक्षक-
दीपिका पांडे 

अपनी समीक्षा में अनंत पुरोहित अनंत जी के उद्गार-

इस सुन्दर कृति के लिए बड़े भाई को ढेरों बधाई सह शुभकामनाएँ। कृति के सौंदर्य की वजह से समीक्षा देने का लोभ सँवरण न कर सका।

प्रक्षालक बू~ यह इस कृति का प्रथम बिंब है। सुगंध इंद्रियबोधगम्य विषय के अंतर्गत हाइकु में मान्य है और एक अच्छे हाइकु के गुणधर्म में आता है।

साथ ही इसका दूसरा बिंब है *दो हजार बीस की लग्न पत्रिका*। मेरे दृष्टिकोण से इसमें दो अर्थ निकलते हैं। एक तो यह कि एक लग्न पत्रिका है जिसमें किसी का विवाह सन 2020 को होना है। और सन 2020 में संपूर्ण विश्व कोरोना महामारी की भयानक त्रासदी से गुजर रहा है। ऐसे विकट समय में जब इस महामारी की कोई औषधि विश्व के पास नहीं है तब केवल सुरक्षात्मक उपायों से ही इससे बचा जा सकता है और हाथों को इस विषाणु से बचाने हेतु हाथ व लग्न पत्रिका दोनों को ही प्रक्षालक (sanitizer) से प्रक्षालित किया गया है।

इसके अलावा एक और गूढ़ अर्थ भी निकाला जा सकता है। सन 2020 की लग्नपत्रिका में कोरोना महामारी की वजह प्रक्षालक की गंध डाल दी।

निस्संदेह यह रचना कालजयी रचना है क्योंकि वर्षों पश्चात भी इसे पढ़कर व्यक्ति इस भयानक त्रासदी को अनुभव कर सकता है। पुनः बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ ।

समीक्षक-
अनंत पुरोहित अनंत

आदरणीया जयश्री जी इस तरह लिखती हैं-

      क्षीरोद्र भैया द्वारा रचित यह हाईकू वर्तमान काल पर आधारित.बहुत सुंदर हाईकू है।जिसमें पहला बिंब प्रक्षालक बू अर्थात सेनेटाईजर की गंध आ रही है।जो कि एक ईंद्रिय बोधगम्य जनित बिंब है।

दूसरा बिंब

दो **हजार*बीस* की ** ** *लग्न* *पत्रिका*

दोहजार बीस की लग्न पत्रिका कहें तो ईसमें कोई विशेष बात नही है परंतु वर्तमान समय में जो *कोरोना* नामक भयंकर माहामारी फैला हुआ है उसे देखते हुए ईसमें विशेष बात हो जाती है कि अभी सब ईस बीमारी से ईतने डरे हुये हैं कि घर में यदि लग्न पत्रिका भी आ रहा है तो उसे भी लोग सेनेटाईजर से धो रहे हैं।ईस बात से ईसकी भयानकता का अनुमान लगाया जा सकता है।

वर्तमान काल पर आधारित यह हाईकू  हमारे हाईकू के नियमानुसार बहुत सुंदर हाईकू है।
समीक्षक-
जयश्री पंडा

[25/04, 11:30 PM] 
अंत में आ. रुनु बरुआ जी लिखती हैं-
सब ने बहुत सुन्दर और सार्थक समीक्षा की है। मेरे लिए कुछ नया लिखने को बचा ही नहीं !  फिर भी लग्न पर लिखना चाहुगीं कि एक किशोर ज्योतिष ने कुछ महीने पहले ही भविष्य वाणी की थी कि कई ग्रहों के एक ही पथ पर आने से विश्व को महामारी के संत्रास से गुजरना होगा और मई के अंत तक यह लग्न रहेगा । जो ज्योतिष चर्चा करते है या ज्ञानी है वह निश्चय ही लग्न पत्रिका से ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति और उसके फल को समझ सकते है । यह रचना समसामयिक विषय पर आधारित अपने आप में एक सम्पूर्ण सारगर्भित सृजन है। विषाणु मुक्त करने हेतु प्रक्षालक बू  ( सेनिटाईजर की गंध) एक बिम्ब है । 2020 की लग्न पत्रिका में विवाह संबंधित मुहूर्त जानकारी दी गई होती है । अतः सामाजिक मेल मिलाप के वर्जन के समय इन पत्रिकाओं अथवा नियमों को पालन करने का कोई औचित्य नहीं रहता। इस सदी की बहुत ही महत्वपूर्ण घटना को आदरणीय क्षीरोद कुमार पुरोहित जी ने अपनी रचना में चिरस्मरणीय कर दिया है । आपको बहुत बहुत बधाई
समीक्षक-
रुनु बरुआ 

इन समीक्षाओं ने इस कालजयी रचना के सभी पहलुओं को उजागर किया जिसने मात्र 17 वर्णों के भीतर सारे नियमों के अंदर सदी की इस भीषण त्रासदी को अपने भीतर समाहित कर लिया। बतौर संपादक मैं लेखक को इस सुन्दर कृति के लिए बधाई व शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ। सचमुच यह कृति इस सत्र को चिरस्मरणीय बनाती सराहनीय कृृृति है। 

       जिन दिनों हम लग्न पत्रिकाओं के जरीए शादी-ब्याह आदि कार्यक्रमों में हर्षित मस्ती कर रहे होते हैं, उन दिनों हम कोरोना जैसे वायरस से जूझते जिन्दगी और मौत का सामना कर रहे हैं। इस विडम्बना को भलीभाँति पिरोए हुए कृति हाइकु के रुप में विस्फुटित हुआ आ.क्षीरोद्र कुमार पुरोहित जी की कलम से। यह समसामयिक रचना आज के परिवेश को अपने में समेटे हुए बहुत से तथ्य सामने रखने में सक्षम है, जो हाइकु का खूबसूरत गुण है।

        वहीं दूसरी ओर दो हजार बीस की लग्न पत्रिका में प्रक्षालक बू की शादी का उल्लेख नजर आता है। हालाँकि यह तथ्य एक काल्पनिक है, परंतु दोनों बिम्ब को साथ देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि कोरोना के आने पर सबकुछ उलटफेर हो गया और कुछ भी संभव हो सकता है। अतः इस पत्रिका में लगता है कि प्रक्षालक बू का लग्न लगा है और इस काल्पनिक विवाह में हम मानव आमंत्रित हैं। जिसमें न चाहते हुए भी जाना पड़ेगा, रुबरु होना पड़ेगा। 

           यही तो हाइकु की खासियत है कि वक्त के यथार्थ चिह्न को हम उसके समीक्षा के माध्यम से कल्पनाओं के पंख डालकर देखें तो हाइकु बहुत ही रोचक भरे लम्बी कहानी हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है श्रेष्ठ हाइकु। आप कृति को जितनी बार नजर दें उतनी दफा मर्म और कहानी आपके जेहन में भर देता है।

          वाह्ह बहुत ही सुंदर और मर्मस्पर्शी कृति आ.क्षीरोद्र कुमार पुरोहित जी। आपको बहुत-बहुत बधाई...

संपादक-
नरेश जगत 
हाइकु विश्वविद्यालय
25 अप्रैल 2020

[26/04, 6:00 PM] मैं सौरभ प्रभात: समीक्षा बतौर अपने शब्दों से इस कृति को आप सबको सुपूर्द करता हूँ...
प्रक्षालक बू~
दो हजार बीस की
लग्न पत्रिका

हाइकुकार - आ० क्षीरोद्र कुमार पुरोहित 

समसामयिक आधार पर लिखा यह हाइकु वर्तमान परिदृश्य का एक जीवंत उदाहरण है। हाइकुकार की यह एक उत्कृष्ट कृति है। हाइकु की यह विशेषता है कि यह पाठकों को कृति का अर्थ निकालने और भाव समझने की पूरी स्वतंत्रता देता है। आइये देखें, मैनें क्या देखा-

*दो हजार बीस की लग्न पत्रिका*
          यह अपने आप में पूर्ण स्वतंत्र बिंब है। इसे पढ़कर पाठक के मन में छवि उभरेगी एक लग्न पत्रिका की, जिसपर वर्ष दो हजार बीस की तिथि अंकित है। निश्चित तौर पर किसी स्नेहीजन की लग्न पत्रिका हाथ में आने पर चित्त प्रसन्न होता है। अतः यह *वाह* के पल हैं। 

अब दूसरा बिंब देखें -
*प्रक्षालक बू*
          प्रक्षालक (सैनेटाइजर)  की गंध एक पूर्ण प्राकृतिक बिंब है, जो घ्राणेन्द्रियों से ज्ञात है। यह पढ़ते ही पाठक के मानस पटल पर वैश्विक महामारी कोरोना से संबंधित एक चित्र स्वतः ही बन जायेगा।

इन दोनों बिंबों के एक साथ आते ही *वाह* के पल *आह* में बदल जाते हैं। तुरंत ही पाठक के हृदय में एक टीस सी उठती है कि क्या समय आ गया है, अपने प्रिय की लग्न पत्रिका को भी पहले सैनेटाइज करना पड़ रहा है। साथ ही कोरोना संकट से जुड़े सभी दुष्कर यादें अचानक ही उसके मस्तिष्क पर अंकित होने लगेंगी और उसका मन कसैला हो जायेगा।

हाइकुकार आ० क्षीरोद्र साहब की यह एक कालजयी कृति है। सादर नमन आपके लेखनी को।

-सौरभ प्रभात 
मुजफ्फरपुर, बिहार

[26/04, 10:24 PM] क्षीरोद्र पुरोहित का आभार...
हाइकु
पटल को सादर नमन 
प्रिय साथियों , 
कल मैंने एक हाइकु पटल पर समीक्षार्थ रखा ।आप सबने मेरी कृति की बहुत सराहा । अपने मंजे हुए अनुभव से उसकी  समीक्षा भी किया ।इस कृति को ऐतिहासिक,कालजयी आदि उपाधि दी।
यह कृति इन उपाधियों के योग्य है या नही यह तो मै नही जानता परंतु यह मेरी अब तक की सबसे अच्छी कृति है । इस कृति का श्रेय आप सब को जाता है।
यह बात केवल विनम्रता और औपचारिकता वश नहीं कह रहा हूँ बल्कि हृदय की गहराई से पटल को समर्पित करता हूँ। मैं पिछले एक साल से हाइकु लिख रहा हूँ ।इसी अप्रैल को पूरा एक वर्ष हो रहा है ।हालांकि मैं बहुत बाद मैं इस पटल से जुड़ा ।  मेरे प्रारंभिक हाइकु और आप सबके सानिध्य के बाद के हाइकु में बहुत अंतर है ।
  मेरी पुरानी रचनाओं को मैं स्वयं ही अब नकार देता हूँ और उनको इस पटल के नियमों में पिरोने का प्रयास कर रहा हूँ ।
 जहां तक कल की मेरी रचना की बात है ये अनायास ही पिछले 3-4 महीनों की वैश्विक त्रासदी को हाइकु में गूँथने का प्रयास किया और आदरणीय नरेश जगत जी के प्रोत्साहन और मार्गदर्शन तथा अनुज अनंत के स्नेहिल सुझाव से हाइकु अच्छा बन पड़ा। बाद में आप सबकी समीक्षा से  ऐतिहासिक हो गया ।   
 सर्व आ0 सौरभ जी, मसखरे जी,तुकाराम जी, सामल जी,आदरणीया विदुषी जी, निधि जी,दीपका जी,कुमकुम,जयश्री पंडाजी,  अनुपमा जी,अभिलाषा जी,ज्योति जी , सुकमोती जी आदि सभी समीक्षकों का आभार।

 क्षीरोद्र कुमार पुरोहित

इस कृति पर विशेष चर्चा जारी है...

[26/04, 11:07 PM] 
Dr. Pushpa Singh g: जिज्ञासावश आप सभी अनुभवी,ज्ञानी जनों से जानना चाह रहे हैं की कोरोना खत्म होने के बाद ऐसे हाइकु जो कोरोना से सम्बंधित है उन्हें कैसे समझ पाएंगे?
  इसमें कोरोना वायरस का जिक्र तो कहीं नहीं है?

राजकुमार मसखरे जी: ये भी कालजयी बनाने के यक्ष प्रश्न .... ये सामयिक रचना कुछ साल बाद अप्रासंगिक हो सकता है।

Anant Purohit g: क्या आपको लगता है कि इस त्रासदी को विश्व कभी भूल सकेगा?

राजकुमार मसखरे जी: यह भी है,,,
       समय काल के अनुसार मस्तिष्क पटल से विस्मृत भी हो जाता है।

Anant Purohit g: अमेरिका के एक वैली मे प्रदूषण(खासकर कोहरे) के वजह से कुछ एक दो हजार लोग मर गए थे वह आज तक नहीं भूल पाया है विश्व 

औल यह तो ऐसी घटना है जिसमें विश्व के लगभग दो सौ देश चपेट में हैं।

राजकुमार मसखरे जी: प्रेमचंद की कहानी सवा सौ साल बाद आज भी सामयिक व प्रासंगिक लकता है।

Anupama Agrawal g: आदरणोय भोपाल गैस त्रासदी ज आज से लगभ 35 वर्ष से भी पूर्वहुई थी उससे भी हमारी आज की पीढ़ी अनभिज्ञ नहीं है।तो ये तो.....कभी न भुलाई जा सकने वाली त्रासदी है।

राजकुमार मसखरे जी: हम भी सहमत हैं साहेब जी ,जी मात्र ये एक पक्ष है, सामान्य विचार है।
मैं तो प्रेमचंद का भी उदाहण दिया ,मैं तो आपकी बातों पर सहमत हूँ,,, साहित्य में ये आगे पीछे के प्रभाव को सोचना पड़ता है,,, यहाँ कई समसामयिक हाइकू  रचना चयनित हुए हैं ,,,उन सभी के लिए भी है,,,
        हाइकू कल्पना नही है, जीवंत है ,जो दिखता है,घटता है ,अनुभव होता है वही लिखा जाता है।

Dr. Pushpa Singh g: प्रश्न ये नहीं कि इस महामारी को लोग बरसों भूल नहीं पाएंगे। किंतु ये पता कैसे चले कि ये हाइकु कोरोना संकट के समय की है।

सौरभ प्रभात जी: क्या ऐसा कोई समय या आपदा पहले कभी आई है जब सैनेटाइजर का उपयोग इस हद तक हुआ हो....अभी बच्चा बच्चा इसका नाम जान रहा है.... प्रक्षालक बू स्वयं ही कोरोना से संबंध जाहिर कर पाने में सक्षम है।

Deepika Pandey g: आ०यह बात हाइकु से स्वतः स्पष्ट हो जायेगी।मैं बताने का प्रयास करती हूँ। हाइकु में दो बातें स्पष्ट हैं...
1.प्रक्षालक बू
2.2020 का कार्ड
पाठक स्वतः सोचेगा कि 2020 का शादी का कार्ड और ऊपर से प्रक्षालक बू??इतना काफी है उसकी जिज्ञासा को शांत करने के लिये कि ऐसा क्यों हुआ होगा।जब वह और इसके बारे में जानने का प्रयास करेगा तो उसे सब समझ आ जायेगा कि प्रक्षालक बू और 2020 के शादी कार्ड के बीच क्या सम्बंध है, जब ये चिन्तन करने लगेगा पाठक तो स्वतः ही इस भयंकर महामारी को पायेगा। इससे जुड़ी सभी घटनाएँ फिर सामने होंगी। हालाँकि इस कृति में कोरोना का वर्णन नहीं है, परंतु उससे जुड़े बिम्ब जो पाठक को चिन्तन करने पर विवश करेगा और विचार करने पर कहीं न कहीं कोरोना के त्रासदी को जरुर पायेगा।

तुकाराम पुंडलिक जी: प्रक्षालक जंतूनाशक हैं, यह बात तो कालातीत हैं । कोई तो बिमारी फैल गई हैं ; यह जरूरी नहीं की वो बिमारी कोरोना ही हो ।

सौरभ प्रभात जी: सहमत हूँ आ०

परंतु किसी भी कालजयी कृति का उद्भव इतिहास अथवा वर्तमान को परिलक्षित करते हुये ही होता है, भविष्य को नहीं। आज से पहले यदि प्रक्षालक का प्रयोग इस चरम तक हुआ हो, तो हमें ज्ञात नहीं, कृपया बताने का कष्ट करें.... रही बात भविष्य में उत्पन्न किसी रोग और प्रक्षालक के संबंध का, तो कृति में उपस्थित *दो हजार बीस* क्या कोरोना से संबंध जोड़ने का लिये पर्याप्त नहीं है.... इसमें तो शायद कोई संशय नहीं होगा आपको आदरणीय कि यह रोग जिसे *कोरोना संक्रमण* के नाम से जाना जा रहा है, यह स्वयं एक कालजयी आपदा है, इसके छींटे मानव मानसपटल से धूमिल तो कभी नहीं होंगें... और *2020* का जब भी नाम आयेगा तो कोरोना संक्रमण काल के लिये इसे याद किया जायेगा.... *प्रक्षालक बू* ने इस बिंब को और ढृढ़ता प्रदान की है मात्र...

Dr. Pushpa Singh g: इसमें तो स्पस्ट है 2020
और वर्षों तक लोग इस महामारी को भूल नही पाएंगे।
इस रचना पर कोई प्रश्न ही नहीं।

हम सब नवोदित हाइकुकार यदि सीखना चाहते हैं तो जिज्ञासा तो होगी ही।
हर विधा में कोई भी पारंगत नहीं होता।इस पटल से सम्बंध अब तो इतना गहरा बन ही गया है कि कुछ पूछा जा सके,सीखना निरन्तर जारी है,फिभी यदि किसी को बुरा लगा हो तो क्षमा...
लेकिन इस बात का वादा नहीं कर सकते कि भविष्य में फिर कभी जिज्ञासा नहीं होगी।

[27/04, 2:13 PM] सौरभ प्रभात जी: क्षमा माँगने की कोई आवश्यकता ही नही है आदरणीया।

पटल का मुख्य उद्देश्य ही चर्चा परिचर्चा से ज्ञानकोश में उत्तरोत्तर वृद्धि करना है। जिज्ञासा तो उठती ही रहेगी और निराकरण भी होता ही रहेगा, हमलोग तो इस सफर में कोई हिस्सेदारी दे सकें, वही जीवन का आनंद है। सादर नमन🙏🏻🌷

हाइकु विश्वविद्यालय

Thursday, 23 April 2020

कुसुम कोचर जी की प्रथम हाइगा...

आदरणीय श्री  नरेश कुमार जी 'जगत'
               सादर नमस्कार! सौभाग्यवश आज पूर्वाशा हिंदी अकादमी पटल पर आपसे 'हाइगा' विधा का कुशल प्रशिक्षण मिला। यह मेरे लिए अत्यंत कौतूहल का विषय था कि 5,7,5 वर्णों में 2 वाक्य और उसने भी एक कविता लिखी जा सकती हैं। दो छोटे वाक्य, जो एक दूसरे के कारक ना हो, और ना ही कथन हो फिर भी एक प्राकृतिक दृश्य को अत्यंत सूक्ष्मता व सुंदरता से वर्णित करते हो, तुकबंदी ना हो, ना ही वे तुलनात्मक हो, और सबसे बड़ी बात कि वह एक फोटो क्लिक हो, शुरुआत में सोचकर यह कठिन लग रहा था, पर यह कहते हुए गर्व महसूस हो रहा है कि आपके सुघड़ मार्गदर्शन से यह कठिन विधा भी हम सब के लिए संभव हो सकी। रंगों से चित्रांकन मेरा शौक रहा है पर शब्दों से चित्रांकन मैंने आपसे आज सीखा। यद्यपि मुझे कई बार संशोधन की आवश्यकता पड़ी पर आपके मार्गदर्शन से उत्तरोत्तर सुधार के प्रति आशान्वित हूं। मैं हृदय-तल से आप के प्रति आभार व्यक्त करती हूं। आपका मार्गदर्शन यूं ही मिलता रहे, यही कामना है।
                     -कुसुम  कोचर 
                         कोलकाता
                         23/4/20
मेरी प्रथम कृति...
आ. जगत जी की समीक्षा...
          आ.कुसुम कोचर जी आपकी प्रथम हाइगा रचना के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई, यह कृति बहुत ही सुंदर है...
       मुस्कुराहट मानव की एक भावनात्मक प्राकृतिक क्रिया है जिसे अंतरमन से ही विस्फुटित कर पाते हैं, जो ओछी नहीं हो सकती और इसके लिए हमारे समक्ष किसी खास कारण होना जरुरी है, जिससे हमारे अंदर की खुशियाँ मुस्कुराहट स्वरुप मानव पटल में नजर आता है। इससे हमारे आसपास के लोगों में भी सहज प्रसन्नता संचार हो जाता है। यह आपका सराहनीय प्रथम बिम्ब है।
       दूसरा बिम्ब आपने लिया है कि वर्षा का पानी जो बालों को भिगोया है, उसे किसी युवति ने गर्दन को झटका देकर मुस्कुराते हुए उक्त पानी के बूंदों को अपनी ओर छिटका दिया। यह बहुत ही सुंदर यौवन स्मृति का चित्रण है। हो सकता है कि युवति हमें रिझाने या छेड़ने के लिए ऐसा किया हो। इस अनुकृति में यह तो स्पष्ट है कि युवति में मादक भरी चंचल प्रवृत्ति है और यह उसके खुशियों को सहज ही बोध कराने में सफल हो रहा है। यह घटना किसी के भी साथ घटे वह अवश्य अविस्मरणीय होगा।
        इस कृति में आपने यौवनपन के एक खास पल को लेकर इस प्रकार दर्शाया है, मानो यह चित्र जीवंत हो और इसके थोड़ी ही देर पूर्व ये घटना घटी हो।
       बहुत ही सुंदर हाइगा के शिल्प में एक भावनात्मक कृति साहित्यिक पटल में प्रदान करने के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई आ.कुसुम कोचर जी, सदैव ऐसे ही भावनात्मक कृतियों से हमें विभोर करती रहें।

आ.अनंत पुरोहित जी की समीक्षा...
      आदरणीया कुसुम कोचर जी को उनके प्रथम हाइगा की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ।

आपकी यह कृति इतनी सुंदर है कि इसमें समीक्षा देने का अपना लोभ मैं सँवरण न कर सका।

       इस कृति की समीक्षा करने से पूर्व हाइकु और हाइगा में कुछ अंतर जान लेना आवश्यक है। हाइकु और हाइगा दोनों ही संरचना की दृष्टि से दोनों में ही 5-7-5 का वर्णक्रम होता है। यह कृति एक चित्र के ऊपर लिखी गई है। स्पष्ट है कि यह एक हाइगा है और यह हाइगा का मूलभूत विशेषता है कि इसे किसी चित्र पर लिखा जाता है। दो जापानी शब्दों 'हाइ' और 'गा' से मिलकर बने शब्द 'हाइगा' का अर्पथ है चित्राभिव्यक्ति। परंतु यहाँ पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न और भी विचारणीय है कि क्या संरचनात्मक दृष्टि से हाइकु की तरह दिखने वाले हाइगा का चित्र से इतर भी कोई अस्तित्व है? यदि है तो फिर सभी हाइकु को एक चित्र के साथ व्यक्त कर देने पर वह हाइगा बन सकता है। इससे स्पष्ट है कि चित्र से हटकर इसका कोई अस्तित्व नहीं हो सकता तभी यह हाइगा है। यही इस विधा को हाइकु से अलग बनाती है। चित्र से हटाकर देखने पर यह अपना अस्तित्व खो देती है।

     अब आपकी रचना पर विचार करते हैं। जब इस कृति को संलग्न चित्र के साथ देखते हैं तो प्रथम बिंब *मुस्कराहट* पूर्णतः एक स्वाभाविक क्रिया है जो मानव मन के भावों को व्यक्त करता है। चित्र में युवती की मुस्कान को व्यक्त करता सुन्दर प्रथम बिंब है आपकी कृति में। साथ ही दूसरा बिंब है *गेसुओं से छिटके वर्षा की बूँदें*। वैसे तो वर्षा हर किसी को प्यारी लगती है किंतु अक्सर यह नवयुवक/नवयुवती को खास आकर्षित करती है। ऐसे में चित्र की युवती की भीगी व बिखरी लटों ने स्पष्ट कर दिया है कि वर्षा पश्चात/दौरान युवती ने अपने बाल झटके हैं और वर्षा की बूँदें छिटक रही हैं। यह मोहक अदाएँ युवतियाँ बहुधा तब दिखाती हैं जब उनके अंतर हृदय को कोई बात गुदगुदा जाए। इस पल को पूर्णतः व्यक्त करती हुई आपकी यह कृति अत्यंत सराहनीय है।

       अब हाइकु से तुलनात्मक दृष्टिकोण पर विवेचना करें तो हम इसे चित्र से पृथक कर विचार करना होगा ऐसे में प्रथम बिंब *मुस्कराहट* अधूरा हो जाता है अतः चित्र से इतर इस कृति का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।यही हाइगा का मूलभूत गुणधर्म है।

आपकी यह कृति एक सुन्दर हाइगा है। पुनश्च आपको कोटिशः बधाई व शुभकामनाएँ।

हाइकु विश्वविद्यालय ब्लाँँग

मनोरमा जैन "पाखी" जी के शब्दों से आइए हाइगा को समझें...

*हाइगा*
23/04/2020
मनोरमा जैन पाखी 
         हाइकु की तरह ही हाइगा भी जापानी कृति है। इसका अपना अलग अस्तित्व है।17वर्णों में जहाँ हाइकु कैमरे की नज़र से दृश्य को देखता है वहीं हाइगा 17वर्णों में चित्र या दृश्य को वर्णित करता है। प्राकृतिक बिंब हाइगा में भी आवश्यक है। 
हाइगा दो शब्दों से मिलकर बना है हाइ+गा अर्थात् हाई --चित्रकारी या पेंटिंग,गा--कविता।
मूलतः हाइगा को हम चित्र कविता कह सकते हैं।
हाइगा काप्रारंभ 17वीं शताब्दी से माना जाता है।तब हाइगा रंग और ब्रुश से बनाया जाता था फिर उसमें कविता लिखी जाती थी।
आज कालांतर में डिजीटल फोटोग्राफी जैसी आधुनिक विधा से हाइगा लिखा जा रहा है।
यद्यपि भारत में जापानी विधाओं को लेकर विरोध है ।कुछ इसे सृजन नहीं मानते और कुछ सिरे से नकारते हैं कि यह विदेशी है ,उस वक्त भूल जाते हैं कि  विदेशी वस्त्र,श्रृँगार प्रसाधन, खाद्य पदार्थ ,मोबाइल ,पेन आदि बहुत सारा सामान विदेशों का उपयोग करते हैं।तब वह विदेशी नहीं लगता?साहित्य विदेशी !!
   तमाम विरोध के बावजूद कुछ रचनाकार हाइकु,हाइगा,हाइबन आदि  जापानी विधाओं पर भारत में काम कर रहे हैं। 
जगत नरेश जी के अनुसार , *चित्र में क्या है उसे बताना नहीं,उसमें क्या हुआ होगा कि ऐसा चित्र बना ?उसका वर्णन करना ही हाइगा है।*
       हाइगा में स्वयं को अलग रख कर चित्र पर गहन बिंब को परखना होता है।प्रतीकात्मक भावनाएँ अमान्य होती हैं।हाइकु की तरह ही एक प्राकृतिक बिंब अनिवार्य होता है।बिना चित्र के हाइगा मान्य नहीं।
हाइगा से संबंधित सामान्य नियम आद. जगत नरेश जी के अनुसार  इस प्रकार हैं--
हाइगा :- 5,7,5 के तीन पंक्तियों में और दो बिम्बों में की जाने वाली अभिव्यक्ति, जिसमें किसी विशेष पेण्टिंग की व्याख्या करती हो और वह लेख पेण्टिंग में ही हो वह हाइगा कहलाती है। इसमें हाइकु के नियम क्रमांक 6 के मानवीकरण के अलावा सभी नियम लागु होते हैं। 

1. दो वाक्य, दो स्पष्ट बिम्ब हो।
2. किसी एक बिम्ब में प्राकृतिक का होना अनिवार्य है।
3. दो वाक्य, 5 में विषय और 12 में बिम्ब वर्णन हो सकता है।
4. दो वाक्य, विरोधाभास भी हो सकते हैं।
5. स्पष्ट तुलनात्मक न हो।
6. कल्पना व मानवीयकरण न हो ।
7. वर्तमान काल पर हो।
8. एक पल की अनुकृति, फोटोक्लिक हो।
9. कटमार्क (दो वाक्यों का विभाजन) चिन्ह हो।
10. दो वाक्य ऐसे रचे जाएँ जो एक दूसरे के पूरक न होकर कारण और फल न बने।
11. रचना में बिम्ब या शब्दों का दोहराव न हो।
12. तुकबंदी से बचें।
13. 5 वाले हिस्से में क्रिया/क्रियापद और विशेषण न हो।
14. 12 वाले हिस्से में एक वाक्य हो।
15. बिना बिम्ब के केवल वर्तनी न हो।
16. पंक्तियाँ स्वतंत्र न हों।
17. विधा प्रकृति मूलक है, किसी धर्म या व्यक्ति विशेष न हो। 

*मेरे द्वारा सृजित हाइगा...* 

समीक्षा आद. जगत नरेश जी द्वारा 
*सुंदर अनुकृति आदरणीया पाखी जी 👌👌 वास्तव में वर्षा वृक्षों पर ही निर्भर है। आपके इस सदृश्य हाइगा में बेहतरीन संदेशात्मक मर्म छुपे हुए हैं।*
    *एक तो बारिश का अंतिम चरण दिखाई पड़ रहा है और लगता है कि कुछ बूँदें अब भी टपक रहे हैं और वो बूँदें धरातल नहीं पहुँच पा रहे हैं।*
     *दूसरा यह कि बारिश वृक्षों पर ही निर्भर होता है।*
    *तीसरा यह कि वर्षा के बाद बूँदें वन में गीले स्वरुप ठहरी हुई हैं।*

मनोरमा जैन पाखी

Tuesday, 7 April 2020

हाइकु के विभाग

हाइगा :- 5,7,5 के तीन पंक्तियों में और दो बिम्बों में की जाने वाली अभिव्यक्ति, जिसमें किसी विशेष पेण्टिंग की व्याख्या हो और वह लेख पेण्टिंग में ही हो वह हाइगा कहलाती है। उदाहरण उपरोक्तानुसार है।

हाइकु :- 5,7,5 के तीन पंक्तियों में और दो बिम्बों में की जाने वाली अभिव्यक्ति, जो मानवीय संवेदनाओं का उल्लेख न करते हुए संवेदनशील का होना और प्राकृतिक का होना पाया जाए। ऐसा लेख हाइकु कहलाता है।

उदाहरण :-

गंगा का तट -
ग्रहण मोक्ष पर
वस्त्र के ढेर।

संजय कौशिक "विज्ञात"

सैर्न्यू :- 5,7,5 के तीन पंक्तियों में और दो बिम्बों में की जाने वाली अभिव्यक्ति, जिसमें धार्मिक या व्यक्ति विशेष और व्यंग्यात्मक श्रेणी की कृति पाए जाते हैं। ऐसा लेखन सैर्न्यू कहलाते हैं।

उदाहरण :-

हल्का भूकंप ~~
सब से आगे भागा
राज ज्योतिषी।

संजय सनन

डेस्क हाइकु :- 5,7,5 के तीन पंक्तियों में और दो बिम्ब में की जाने वाली अभिव्यक्ति जिसमें पूर्णतया काल्पनिक हो, ऐसी कृति डेस्क हाइकु कहलाती है।

कन्नौज इत्र...
डाकिए के थैले में
उसका खत।

संजय सनन

हाइबन :- एक ऐसा तथ्य जो यथार्थ हो और वह तथ्य प्राकृतिक न लग रहा हो तो उस तथ्य को स्पष्ट करते हुए डायरी की तरह उस तथ्य का वर्णन करके अंतिम में 5,7,5 के तीन पंक्तियों में और दो बिम्बों में की जाने वाली सार तत्व की अभिव्यक्ति हाइबन कहलाती है।

उदाहरण :-

     आश्चर्य कर देने वाला बोलीविया का वह स्थान, जहाँ हजारों तालाब सूखकर मोटी नमक की परत जमी हुई है। यह परत दूर-दूर तक फैले होने के कारण इसका छोर एक नजर में दृष्टिगोचर नहीं हो पाता और पता नहीं चलता कि धरती कहाँ तक और आसमान कहाँ तक है। इस तरह दोनों का संगम इस तरह विलय हो जाकर आकाश का प्रतिबिम्ब शीशे की तरह इस नमक के परत में नजर आता है कि यहाँ पहुँचने पर ऐसा लगता है मानो हम आसमान में बादलों के साथ सैर कर रहे हों। जहाँ हम मंत्रमुग्ध होकर विचरण करते कब समय व्यतीत हो जाता है पता ही नहीं चलता। सारी दुनिया को भूलकर यहाँ खो जाना किसी जादुई से कम नहीं। जी करता है बस हम यहीं के होकर रह जायें। सचमुच प्रकृति का यह अद्भूत दृश्य कोई सपनों से कम नहीं। इस अकल्पनीय दृश्य को हम कैमरे में कैद करना कदाचित नहीं भूलेंगे। जहाँ हम पाते हैं...

नोन परत --
बादलों के बीच वो
सपरिवार ।

इनके साथ ही हमें बिम्ब और विभाग के अनुसार हाइकु के कुछ नियम फेर बदल हो सकते है। परंतु हाइकु के लिए यह नियम आवश्यक होता है। नियम...

1. दो वाक्य, दो स्पष्ट बिम्ब हो।
2. किसी एक बिम्ब में प्राकृतिक का होना अनिवार्य है।
3. दो वाक्य, 5 में विषय और 12 में बिम्ब वर्णन हो सकता है।
4. दो वाक्य, विरोधाभास भी हो सकते हैं।
5. स्पष्ट तुलनात्मक न हो।
6. कल्पना व मानवीयकरण न हो ।
7. वर्तमान काल पर हो।
8. एक पल की अनुकृति, फोटोक्लिक हो।
9. कटमार्क (दो वाक्यों का विभाजन) चिन्ह हो।
10. दो वाक्य ऐसे रचे जाएँ जो एक दूसरे के पूरक न होकर कारण और फल न बने।
11. रचना में बिम्ब या शब्दों का दोहराव न हो।
12. तुकबंदी से बचें।
13. 5 वाले हिस्से में क्रिया/क्रियापद और विशेषण न हो।
14. 12 वाले हिस्से में एक वाक्य हो।
15. बिना बिम्ब के केवल वर्तनी न हो।
16. पंक्तियाँ स्वतंत्र न हों।
17. विधा प्रकृति मूलक है, किसी धर्म या व्यक्ति विशेष न हो।

मुख्य संचालक
हाइकु विश्वविद्यालय
नरेश कुमार जगत "प्रज्ञ"

*गुंजन : एक अनोखा हाइकुसंग्रह*

 *गुंजन : एक अनोखा हाइकुसंग्रह* हिन्दी भाषा में हाइकु विधा का कार्य निरंतर चल रहा है ౹ हाइकुकार तो हाइकु लिखते रहते है, लेकिन, इन हाइकुकारों...